उन्मनी वाङमय

२३ जानेवारी १९३९

२३ जानेवारी:

एकूण श्लोक: ७

 

संध्याकाळी ०७.०५

 

आज उघडला तिसरा नयन।

जयाचें नामाभिधान शांकर-ज्ञान।

वस्तुमात्रीं श्रीरामाचें अखंड-ध्यान।

सर्व परिपूर्ण सुखरूप  ।।      ।।१।।    

 

जयाचें मायीक रूप।

चर्म-चक्षू देखती अमूप।

ज्ञान-चक्षू पाहे श्रीराम-रूप।

तो सोहळा अलौकिक    ।।    ।।२।।    

 

हें जड की श्रीचैतन्य-घन।

ऐसा उठे तेथ प्रेम-प्रश्न।

तेव्हां जड-वाद सोडी पंच- प्राण।

श्रीराम-ध्यान स्वयं उरे  ।।        ।।३।।    

 

उठा उठा हो लवड सवडीं।

प्रेमें आठवा संतचरित्र गोडी।

नामसंकीर्तनाची सदा धडधडाडी।

वाहूं द्या अंतर्बाह्य   ।। ।।४।।    

 

रसाळ प्रेमळ शंकर चरित्र।

आठवा, बोला दिन-रात्र।

तेणें इह-परत्र-सर्वत्र।

श्रीराम-सुखचि भोगाल   ।।    ।।५।। संध्याकाळी ०७.२६   

 

रात्रौ ०९.१०

 

‘रं’ उष्मप्रकाश विद्युत्।

‘शं’ श्री प्रातिभात्म - परस्तत्।

‘गं’ कर्तृकबीजं कैवल्यसत्।

त्रिसुपर्णा ‘रशगा’!    ।।                ।।६।।    

 

रात्रौ ०९.२८

 

‘कं’ विशुद्धिजा गगन ज्योति:।

‘यं’ मौक्तिक  दर्शनांची स्वाती।

‘लं’ संवित्श्रीची स्वयंभू द्युति।

त्रिकूटा ही ‘कयल्’ पाद   ।।            ।।७।।

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