उन्मनी वाङमय

११ एप्रिल १९३९

११ एप्रिल: 

एकूण श्लोक: ८

 

संध्याकाळी ०५.००

 

भावनिर्झराची मूलगंगोत्री।

‘मध्यमा’ नाम वागवस्थिति।

चौफाळल्या स्थूलार्धाची द्वितीयव्याहृति।

सांत अवस्थांचें कारणतत्त्व।।          ।।१।।

   

हेतुहेतूंचीं उपकरणें।

साध्या साध्याचीं साधनें।

ध्येयाध्येयांची ध्यानमननें।

मध्यमेंत उद्भवती ।।          ।।२।।

   

मौलिक अनुभूति परात्परस्फूर्त।

इतरा अवस्था मध्यमांतर्गत।

किंबहुना अवस्थामात्राचें कारकतंत्र।

मध्यमास्थ भावतत्त्व।।                ।।३।।

   

मौलिकाचीं व्यस्त प्रतीकें।

भूतचालीचीं उलटीं पाउकें।

पदार्थप्रतीतीचीं केंविलवाणीं सुखें।

मध्यमेंत जातकतीं  ।।          ।।४।।

   

अनुभवा अनुभवास अवस्थेंत वोपणें।

मूल्यामूल्यास मर्यादेंत मूर्तणें।

तत्त्वातत्त्वास स्थलकालांत स्थापणें।

मध्यमेचें भावकार्य हें ।।            ।।५।।

   

वैखरीचें हें सूक्ष्मस्थंडिल।

भ्रमप्रतीतींचें भुलाव मंडल।

विवर्त व्यवहाराचें धूसर कीं अविरल।

मध्यमेचा आविष्कार ।।        ।।६।।

 

संध्याकाळी ०५.३२

   

हृदिस्था ही वाग्बीजशक्ति।

मूर्तिमती जणु स्वेतरासक्ति।

उद्भूता जेथ द्वैतानुभूति।

आणि ‘तत्त्व’मादि व्यवहार ।।          ।।७।।

   

दोन हस्तांचें एक आंदोलन।

दोन चरणांचें एक आगमन।

दोन मित्रांचें प्रीतिरसायन।

विलास अवस्थाविश्व हें!   ।। ।।८।।

 

संध्याकाळी ०६.४८

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