उन्मनी वाङमय

१३ जुलै १९३९

१३ जुलै

एकूण श्लोक: ९

 

ज्वाले ज्वालेंतली दहनक्रिया।

माले मालेतली गुंफन क्रिया।

छाये छायेंतली शीतन क्रिया।

‘वियत्काय’ रूपें प्रत्यक्कुरू!  ।।            ।।१।।    

 

‘ह’ हें स्वस्वरूप रूद्रतत्त्वाचें।

‘रं’ हें प्रकृतिबीज रूद्राणीचें।

‘ई’ हें उपकरण संयोजनाचें।

‘र्‍हीं’ मूर्ती ही श्रीवियत्कायवर्तिनी!  ।। ।।२।।    

 

‘क’ हें विभुत्वाचें व्यंजक।

‘लं’ हें शून्यस्वाचें निदर्शक।

‘ई’ हें उभय बिंदूंचें संस्थापक।

‘क्लीं’ मूर्ति ही श्रीवियत्कायपूर्तिनी!।।                ।।३।।    

 

‘शं’ हें सप्त्वाग्बीजांचें ज्ञापन।

‘रं’ हें नैज्यस्वस्वरूपाचें रव्यापन।

‘ई’ हें मिथुनीकृत द्वंद्वाचें व्यापन।

‘श्रीं’ मूर्ति ही वियत्कायस्था महाचित्त्!  ।।      ।।४।।    

 

समन्वितांचें सम्यक् संयोजन।

व्यतिरिक्तांचें विष्वक् विभक्तीकरण।

भूमाभानांचें ऊर्जस्वल दीधीतन।

वियत् स्थंडिलीं अखंडाकारले!।। ।।५।।    

 

चतुर्थकोनांत प्रत्यक्भान-निवेश।

सिद्धलेल्या ‘साई’ वृत्तींचा स्वयंपूर्ण आवेश।

धूतलेल्या चिन्मुकुलांचा उन्मेष।

पदभूत-पिंडतत्त्वाचें स्वरूप हें! ।।        ।।६।।

   

पद हे पिंड सृष्टीचें लक्षपीठ।

पिंडतत्व हें पदबीजाचा महामठ।

सिद्धभान हें मठपीठाची एकवट।

कूटस्थाची स्वरूप-ज्ञत्पी।।              ।।७।।    

 

उदयशयलीं चमकतां सिद्धभान।

स्वस्वरूप-प्रत्यक्तेचें पूर्णानुसंधान।

तदा इंद्रियादिंचें सहजोत्थित विंदान।

इतरत्र सर्व मूढग्राह  ।।              ।।८।।    

 

विषयग्रह म्हणजे भेदग्रह।

भेदग्रह म्हणजे स्वस्वरूपाचा विस्मृभाव।

निर्विकल्प कूटकैवल्याचा तिरोभाव।

पदचुत्ती ही पिंडतत्वाची  ।।              ।।९।।    

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