उन्मनी वाङमय

८ ऑगस्ट १९३८

८ ऑगस्ट

एकूण श्लोक १११

 

 

‘अल्लख’ शून्य-सृष्टीच्या विभो।

विभुत्वांत अवतरल्या नभो।

नभ:स्वरूप गौर शंभो!।

तुला ही शरणागति।। ।।१।।

 

अनंत शून्यांचे तूं शरण।

अनंत शरणांचे आवरण।

आवरणांचें वितरण।

देह विदेहत्याग ।। ।।२।।

 

देह आणि शून्य।

शून्य आणि (विदेह) गगन।

गगन आणि (भाव) जनन।

सर्व सृष्टींचे ।। ।।३।।

 

देहासि शून्याचा आलंब।

शून्यांत देहास प्रारंभ।

महानभाचा आरंभ।

नभामध्यें।। ।।४।।

 

अंतराळीचें वितान।

तेथ नक्षत्रांचे आभरण।

तयांचे उदय-अंतर्धान।

अंतरामध्ये ।। ।।५।।

 

नक्षत्रांची शिवाशिवी।

शून्यवृत्तींची धावाधावी।

प्रारंभिली इंद्रियग्रामीं।

येथें शून्य भोज्या ।। ।।६।।

 

समुद्रांतले शिंपले।

मौक्तिकांनीं लिंपले।

अंतराकाश वेल्हावलें।

निर्गुणप्रकाशें ।। ।।७।।

 

कुंडलिनी शून्यसर्पिणी

अहंता ही भावदर्पिणी।

अहंतेची शून्यांत मिसळणी।

या नांव विश्वदेह ।। ।।८।।

 

विश्वाला आला उजळावा।

या प्रकाशांत चित्खंड तळपावा।

तळपतांच थिजावा।

देहरुपें ।। ।।९।।

 

चेतनेचें थिजलेंपण।

तया जडत्व हें अभिधान।

नाम हें ध्यान।

व्यक्तावलें।। ।।१०।।

 

व्यक्तत्वाचे स्थितीसी (मुळासी)।

स्थान नाहीं नेत्रेंद्रियांसि।

नेत्र, दृक् दृश्य ही भ्रमराशी।

तेथिलें राजगुह्य निराळें ।। ।।११।।

 

व्यक्त अव्यक्त ।

दृष्ट अदृष्ट।

भात अभात । 

दोन्हीं शून्यामध्यें ।। ।।१२।।

 

अस्तित्व शून्याचें भान । 

सत् असताचें प्रकाशन।

कर्णेंद्रिय म्हणजे अगेयाचें गान।

रम्य ही अलखपुरी ।। ।।१३।।

 

हीच सोन्याची नगरी। 

येथ सुगंधाची झरी।

सुवर्ण सुगंध एकसरी।

विलसे येथ मात्र ।। ।१४।।

 

शून्य आणि अस्तित्व ।

प्राण आणि अपान।

विवर्ण आणि सुवर्ण । 

या नांव अलखपुरी ।। ।।१५।।

 

अलखपुरीचें लक्ष्य। 

परमेष्ठीशींही करील भक्ष्य।

व्यष्टि समष्टि समक्ष। 

गिळिल्या तिनें ।। ।।१६।।

 

अलखपुरीचा मी सम्राट । 

शून्यरूप माझें विराट।

सच्चिदानंद कांठोकाठ।

भरूनि येथ उतावतो ।। ।।१७।।

 

निर्गुण विश्व हें आघवें । 

उन्मनींत माझ्या संभवे।

मन उन्मन, व्यय अव्यय।

शून्यीं एकरूप।। ।।१८।।

 

बघा, पहा अलखपुरीचें गोपुर।

तेथ नाचा, घाला नूपुर।

अनास्तिक्यांत मिळवा सूर।

नर्तनाचे  ।। ।।१९।।

 

वस्तुवृत्ती हा अलखपुरीचा नाद।

भाव हा अभावाचा पडसाद।

मृत्यूंत जीवन बाद।

करितां अमृतत्व चमके।। ।।२०।।

 

अलखपुरीचें सिंहासन।

त्या सिंहासनीं विराजे उन्मन।

उन्मनाचें विस्तरण। 

विश्व सारें  ।। ।।२१।।

 

अलखपुरी चतु:सीम।

चतुर्देह त्या नाम।

निरंजनाचें निजधाम । 

आणि जड अजडाचें ।। ।।२२।।

 

ब्रह्म जड, अलख् अजड। 

आस्तिक्य ओसाड।

शून्य गाभा।

जयजय अलख् यमुना ।। ।।२३।।

 

तुझ्या कृष्ण सलिलीं । 

आले स्नाना जे।

तेथ विसरले अवधान। 

शून्यदेशींचे लोकेश्वर  ।। ।।२४।।

 

लोकेश्वरांचे (चित्) चरण रज।

हेचि दशदिशांचे दिग्गज।

गोप गोपाळांचे व्रज ।

कोटि विश्वे ।। ।।२५।।

 

लोकेश्वर हे गोपाळ । 

त्यांचे गोप अलख आभाळ।

वटपर्णींचें आद्य कृष्ण बाळ। 

त्यांचा श्वास ।। ।।२६।।

 

कृष्णाचें आकर्षण ।

शून्योत्तमाचें मुरलीवादन।

असताचे सद्भान। 

अतिसद्रुप।। ।।२७।।

 

सृष्टीची कृष्णमंजिरी।

लोकेश्वरांनी उन्मनींत पिंजली।

दशएक इंद्रियें मुरडलीं ।

या नांव एकादशी ।। ।।२८।।

 

लोकेश्वरांची पाउलवाट।

सजीवतेची गर्दी घनदाट।

अलख-यमुनेचा घांट।

जडाजड विश्व  ।। ।।२९।।

 

गंगायमुनांचा संगम।

लोकेश्वरांच्या प्रतीतीचें वर्म।

बृहत्शून्य अलख्दान।

जयजय! प्रयागराजा ।। ।।३०।।

 

ध्यानाचा निर्ध्येयांत ।

मानव्याचा लोकेश्वरांत।

लोकेश्वरांचा अलखांत।

तिरोभाव  ।। ।।३१।।

 

चैतन्य हें तिरोभावन।

जडाचें निमज्जन।

अंजिततेचें निरंजनपण।

सावकाशें ।। ।।३२।।

 

एक एकांचा आत्मयज्ञ।

जीवन मृत्यूचा व्यापार धन्य।

लख् अलख् अनन्य।

निरंजन प्रयाग राज।। ।।३३।।

 

`भूमा' हें सद्भावपण।

कर्पूररूप सत्त्वाविष्करण।

परि त्रिगुणांचें गुणातीततन।

ती निरंजनाई!  ।। ।।३४।।

 

कर्पूरगौर करुणावतावर।

ब्रम्हभावाचा आविष्कार।

दग्धकर्पूर लक्ष्य विकार।

तेथ अलख् गंगोत्री   ।। ।।३५।।

 

लोकेश्वर दग्धकर्पूर घ्राणिती।

थिजल्या चेतनेसी प्राणविती।

अनिर्वाच्या भाणविती।

भ्रूमध्यांत  ।। ।।३६

 

लख् अलखाच्या प्रयागीं।

डुंबती लोकेश्वर निस्संगी।

नभोजलाच्या कृष्णरंगीं।

असें हें कृष्णरूप!  ।। ।।३७।।

 

‘कृष्ण’ ही शून्यसमष्टी।

तयांत लोकेश्वर एक एक व्यष्टी।

कृष्ण किरणसृष्टी।

लोकेश्वर किरण  ।। ।।३८।।

 

जयश्रिये ! जय श्रिये ! श्यामले!।

अरुपशून्यीं नटलिये।

अलखांत वठलिये।

(अलख्) लकलकावती  ।। ।।३९।।

 

परमेष्टविण्यास समष्टवितो।

समष्टिवण्यास व्यष्टवितो।

व्यष्टविण्यास शून्यवितो।

मी ‘अलखानंद’ ।। ।।४०।।

 

अलखानंदाचीं देहरंध्रें।

घमघमतीं समाधिमेघसुगंधें।

तयांत शून्यभावें अनुसंधे।

विराट-जाणीव  ।। ।।४१।।

 

माझी चित्त सखी श्यामला।

कृष्णत्वाची साकारलीला।

जियेंत दरवळला।

अलक्ष्यगंध ।। ।।४२।।

 

मोतियासी पाड वेज।

समाधिपुष्पें सजवी शेज।

भ्रूमध्यांतं सुखेनैव नीज।

आत्मतत्त्वा !  ।। ।।४३।।

 

वेच ओघळलेले मणी।

सांवरी जन्ममृत्यूंची वोढणी।

शून्योत्तमाच्या श्यामलगगनीं।

‘अलख्’ वीज लकाके  ।। ।।४४।।

 

कोटिकल्पांचे गोकुळ।

कृष्णनीरानें केलें उजळ।

रास करिती सकळ।

शून्यवृत्ती गोपी  ।। ।।४५।।

 

हिरण्मय विराट विश्वदेह।

हाचि गोवर्धन उत्तुंग अफाट।

प्रकाशांगुलिनें सांवरला नीट।

भालपदीं प्रकाशकलिका  ।। ।।४६।।

 

कृष्णनीराच्या पृष्ठावरी।

नीलकमलांची पडली सरी।

लाडकी श्यामला साजिरी।

डुंबे तेथें  ।। ।।४७।।

 

एक एक कमलातें खुडी।

पुन: पुन: कृष्णनीरीं घेई उडी।

तिरोभावाची लग्नसाडी।

श्यामला-देहीं  ।। ।।४८।।

 

व्रजभूमी हिरवी चार।

हिरवे वृत्तीचा आधार।

तेथ पदानुपदाचा संचार।

श्यामवृत्तीचा   ।। ।।४९।।

 

प्रेमाचा विलय अद्वैतीं।

अद्वैतें सर्व श्यामलती।

श्यामलतेंत अलक्ष्यमूर्ती।

मूर्तावली  ।। ।।५०।।

 

संध्याराग प्रेमवृत्ती।

निशाराग अलक्ष्यप्रीती।

राधिका ही संध्यास्थिती।

श्यामावली कृष्णरूपीं  ।। ।।५१।।

 

जय श्रियें! जय श्रिये! श्यामले! ।

चित्त देहास तुवां रंध्रिलें।

शून्यरंध्रांत त्या फुंकिलें।

बासरीगीत  ।। ।।५२।।

 

शून्यांत मुरलीनाद।

जन्मे वाहातो अगाध।

तेथ ऐकूं आली साद।

लोकेश्वरांची  ।। ।।५३।।

 

अरे देख् देख् इंद्रधनु।

ओळख तेथला कृष्णकिरणु।

श्यामलेची उन्मनू।

आलिंगी सुखें ।। ।।५४।।

 

अलक्ष्याचा बीज निक्षेप।

करितो मी श्यामलेच्या कुशींत।

तेथ जन्मती आदिनाथ।

जन्मातीत  ।। ।।५५।।

 

अहा! श्यामले! धन्य तुझी कूस।

शून्यवृत्तींची रत्नमूस।

भूमभावाचा अरुपकळस।

अधिष्ठान तें गिरनार   ।। ।।५६।।

 

लयसाक्षित्त्वाचे उसासे।

निरवस्थेचें भानुबिंब विलसे।

इंद्रधनु अरुपतेंति भासे।

हा ‘श्याम’ उष:काल   ।। ।।५७।।

 

जन्ममृत्यूंचीं आगमागमें।

तिच्या अश्रुबिंदूंचें ठिबकणें।

त्यांच्या व्यक्तरूपा उष्णविणें।

विरल विण्या   ।। ।।५८।।

 

विरलवुनी घनविणें।

घनवुनी विरलविणें।

चेतवुनी निश्चेष्टविणें।

श्यामलेची रासलीला  ।। ।।५९।।

 

श्वेतवुनी श्यामविणें।

श्यामवुनी श्वेतविणें।

श्वेतश्याम उभयान्वयिणें।

श्यामलेची रासलीला ।।६०।।

 

मौक्तिक धनु त्रिशंकु सूर्यबिंब।

पृथ्वी आप वायु तेजोनभ।

तेजोनभाचें अंतर्नभ।

श्यामप्रकाश!   ।। ।।६१।।

 

जय कृष्णिये! तुझिया मुखांत।

मृत्यूविश्व झालें व्याकृत।

भ्रूमध्य देवता देखत।

पुत्रनवल ।। ।।६२।।

 

अंगुलितेजाची अनुवृत्ति।

हाच दाम उदरीं धरिती।

श्यामत्व भोगिती।

दामोदर  ।। ।।६३।।

 

भूमाजलांची गंगा उल्हासे।

तेथ शून्यनभाची प्रभा भासे।

ब्रह्म श्याम विलसे।

बिंब प्रतिबिंबीं  ।। ।।६४।।

 

सखे श्यामले! सखे श्यामले!।

समाधिनेत्रींच्या बाह्वले।

तुरीयेच्या सांवले।

नमन तुला ।। ।।६५।।

 

औट हात देह।

औट अंशांत अहंभाव।

चित्, प्रकृति, महत्, देह।

येथ चिद्रूप अर्धें  ।। ।।६६।।

 

अर्ध सत्य, अर्ध असत्य।

आगमनिगमाचें रुप हेंच।

श्वास नि:श्वास मूर्तवीत।

शून्यिकेचें स्वरूप   ।। ।।६७।।

 

शून्यनभांतुनि वोसंडत।

लोकेश्वरांचे दिव्यहेत।

सहस्त्रारपत्रीं बिंबत।

त्यांचे छायाश्वास  ।। ।।६८।।

 

पश्यंतीच्या पादुकांवरी।

शोभे श्यामला साजिरी।

ब्रह्मश्याम वृत्तीची पंढरी।

वसे विठ्ठला जेथ  ।। ।।६९।।

 

मध्यमेंत श्वास नि:श्वास थबकती।

वैखरींत वेताल नाचती।

परि, परावाचेवरी चेतविती।

श्रुति-देहांना ।। ।।७०।।

 

जयजय! ‘श्याम’ शब्दा! श्रुतिदेवा!।

परार्थाच्या परमवैभवा।

लक्ष्यवृक्षींच्या अलखरावा!।

दोन पक्षी  ।। ।।७१।।

 

चला नीलांगणीं नाचूं।

चला श्याम शब्दा वाचूं।

चला परानुभूतीचे रचूं।

उंच उंच गिरनार  ।। ।।७२।।

 

विश्वदेहाच्या रोमरोमीं।

जाताsजाताच्या रूपनामीं।

भिनलों, भिजलों, थिजलों मी।

श्यामरूप कृष्णश्याम  ।। ।।७३।।

 

हिमगिरीच्या माथ्यावरी।

उदेली ‘श्याम’ - शब्दश्रुतिझरी।

तिचा पडसाद गिरनारीं।

अनुभविला मीं   ।। ।।७४।।

 

अंतरगगनीं उंचावला।

श्यामभाव साकारला।

कीं ब्रम्हपुत्रानद ठाकला।

त्या नांव ‘गिरनार’ ।। ।।७५।।

 

अलख्राजाचा अबदागिर।

समन्वयाचें गोठलें नीर।

आनंददरींचा ‘वेडापीर’।

हा स्फूर्तिक्षण  ।। ।।७६।।

 

जय श्रिये! जय श्रिये! भारतिये।

मी शुक, श्यामले! तूं मूळसरस्वतिये।

अतितुरीये! श्यामसमाधिये!।

चुंबन हें तुझें माझे  ।। ।।७७।।

 

वस्तुप्रतीतीचा पीतांबर।

चित प्रतीतीचा धवल निर्झर।

दोहोंत भिजला श्यामलेचा पदर।

गौळण ही गोपुरींची ।। ।।७८।।

 

देहवृत्तींचा केशकलाप।

धवविला यमुनाडोहीं साफ।

चित्-बुद्बुद स्फुरले अमाप।

चित्त सहस्त्रारलें ।। ।।७९।।

 

हीरक पौर्णिमा चतुर्थावली।

बिजेची कोर वर्तुळली।

इंद्रधनू सामावली।

कृष्ण बिंदूंत  ।। ।।८०।।

 

परेवरचा प्रकाशलेख।

जेथ अनंत सहस्त्रारें बेरजलीं एक।

जेथ अनंत अमृतांचा अभिषेक।

तेथ आपुलें आलिंगन   ।। ।।८१।।

 

वस्तुप्रतीतींतील धवलिमा।

सुषुप्तींतिली सुषमा।

तुरीय तेजाची पौर्णिमा।

सखे! श्यामले! तूं  ।। ।।८२।।

 

प्रकाशाचा एक सुगंध।

अंतराकाशीं दुडदुडे मंदमंद।

धनु:सप्तंगाचे बंध।

तटतटा  तुटती  ।। ।।८३।।

 

अवकाश रचिला सौख्यश्वासें।

देहदुग्धाचें भांडे नासे।

विरूपाचा डंख डसे।

आरूढलों सिद्धपदीं  ।। ।।८४।।

 

सिंहिणीवरचा स्वार।

धरेचा आधार।

विश्वाचा व्यापणार।

सिद्ध माझें विश्वत्त्व  ।। ।।८५।।

 

अंतर् वायूंच्या लहरींवर।

लोकेश्वर हिंडती चौफेर।

त्यांच्या वाहनांकीं क्षणभर।

आरूढलों, सिद्धलों  ।। ।।८६।।

 

कालाच्या श्वेतपार्श्वावरी।

अकालाचा कोट उभारी।

श्यामलेच्या मंदिरीं।

स्थिरावे म्हणुनी ।। ।।८७।।

 

शब्द जान्हवी फेंसाळली।

प्रातिभज्ञानें उसळलीं।

अनंत अज्ञाते घुसळलीं।

फेंकिलीं तीं तीरावरी  ।। ।।८८।।

 

आनंदमेघ वोळंगला।

अरूपभाव सिद्धावला।

श्यामरंग रूढावला।

श्यामसिद्धीची चंद्रिका  ।। ।।८९।।

 

सिद्धींचीं उपायनें झिडकारिलीं।

जन्मकथंताज्ञानें भिरकाविलीं।

मोक्षमुळें गिरकाविलीं।

श्यामगंगेंत।। ।।९०।।

 

आरूढ माझें गंगाधरस्वरूप।

जळूनी उडाला वृत्तिज्ञानाचा धूप।

ऐसा अरूपाचा भूप।

कृष्णरूप मी ।। ।।९१।।

 

माझें कृष्णाचें यमुनेंत स्नान।

यामुन्यभावाचें आविष्करण।

सप्त्भूमिकांचें अंतर्श्वान।

तेथल्या डोहीं  ।। ।।९२।।

 

समाधिऋद्धीचे तेजतुषार।

चातुर्थ्याचे नील आविष्कार।

परात्परतेचा नि:शब्द $ कार।

सखा मी श्यामलेचा ।। ।।९३।।

 

जय श्रिये! जय श्रिये! मंगले!।

प्रलयाग्नीच्या महाज्वाले!।

अंतराकाश कृष्णलें।

तुझिया स्पर्शें ।। ।।९४।।

 

विस्तव पेटला विरूपाचा।

हविर्भाग प्रत्यग्रत्नांचा।

तेथ सखी अपरोक्षतेचा।

साक्षात्कार  ।। ।।९५।।

 

प्रत्यगात्मा जडावला।

बृहत्सूर्य थंडावला।

अखंडचंद्र खंडावला।

षोडशकला  ।। ।।९६।।

 

द्वादशांत झाली स्फुल्लिंगवृष्टी।

त्रयोदशांत शून्यसृष्टी।

चतुर्दश भुवनांचे पृष्ठीं।

श्यामलेचे पदन्यास  ।। ।।९७।।

 

पौर्णिमेचा प्रभास।

चतुर्दशीचा अवभास।

त्रयोदशीचा तांबूल विकास।

द्वादशीं उल्हास उदय  ।। ।।९८।।

 

चिद्भस्म चर्चिलें भालीं।

गोषांत दडली प्रकाशांगुली।

मणिपद्मक्षेत्रीं न्हाली।

देहचिती ।।     ।।९९।।

 

तेव्हां कोटिभास्कर चंद्रले।

संवित तेज विद्युतलें।

आत्मोनुभव इंद्रियले।

हें सिद्धारूढपण ।। ।।१००।।

 

स्वस्ति श्रिये! दीपशिखे!।

प्रभे अनंतते अलखे।

या सुप्रभातीं फांके।

उषाबिंब तुझें  ।।        ।।१०१।।

 

आंतर् उपाधींचें कज्जल।

तये ज्ञाननेत्र नील।

तया सौतिनी अश्रुवील।

समाधिधानीं  ।।        ।।१०२।।

 

भद्रोत्तमा सौदामिनी।

अंतरींची तेजोयामिनी।

सखी कृष्णभामिनी।

श्यामला माझी  ।।        ।।१०३।।

 

महद्अंबे! शांभवी अंतर्ज्योती।

अनंतते अरूपाख्याती।

तुझ्या नेत्रनीरीं न्हातीं।

बिंबें माझीं  ।।         ।।१०४।।

 

प्रथम वृत्तींत स्फुरण।

द्वितीयेंत प्रतीतन ।

तृतीयेंत स्फूर्तन।

नीलशून्य तुरीयेंत   ।।         ।।१०५।।

 

पराप्रकृतीचा संभार।

कलिकेनें लाथाळला चौफेर।

देहाहंभाव साकार।

चहूंकडे   ।। ।।१०६।।

 

स्वस्ति श्री! कलिके! दीप्तिदेवि!।

तुझा उजेड अंतर्विश्वीं।

तुझा अंधार बाह्यभावीं।

त्या नांव वृत्तिज्ञान  ।।          ।।१०७।।

 

सुवर्णासी मृत्तिकवलें।

चिद्गगनासी पवनविलें।

चेतनेसी देहविलें।

वृत्तिज्ञानें ।।         ।।१०८।।

 

चिद्वस्तूसी स्थलविलें।

चिद्रूपासी चतु:सीमिलें।

अनंततेसी सांतविलें।

ज्ञानदर्पें   ।। ।।१०९।।

 

स्वस्तिश्रिये! निरंजने! ।

आतां उधळी समाधिधनें।

चिद्गगनींच्या उन्मनें।

दुभवी राऊराया  ।।          ।।११०।।

 

प्रार्थनेचे नि:श्वास।

थिजले त्यांचे शब्द न्यास।

साकारले हे देहविशेष।

अलखाचे  ।। ।।१११।।

 

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