उन्मनी वाङमय

१५ ऑगस्ट १९३८

१५ ऑगस्ट

एकूण श्लोक: १०७

स्वस्तिश्रिये। स्वस्तिश्रिये। निष्कलते।

आनंद भावाच्या परिपूर्ते।

निष्प्रकाश विद्युल्लते।

चमकतये ।। ।।१।।

 

 

येथली स्फूर्ति फेसाळ।

येथली मूर्ति विक्राळ।

येथली वृत्ति तेजाळ।

बिल्व पत्र हें  ।।          ।।२।।

 

येथ गं बीज उन्मळलें।

येथ रं बीज प्रफुल्ललें।   

येथ हं बीज निर्मळलें।

बीज ब्दय विनाश   ।।          ।।३।।

 

तृतीय मध्य बीजाचा प्रकाश।

अस्मितेचा नव नवोन्मेष।

संथि भावनांचा उल्हास।

चिदंश हा   ।।          ।।४।।

 

स्वस्ति श्रिये! निजशक्ति।

पूर्णानंदाजी अंशरति।

अनंतत्वाची शरणगति।

सांत पदीं  ।। ।।५।।

 

निष्पभतेंत मोहोरलें।

निराभासें प्रकाशलें।

निरूत्थानीं स्थिरावले।

अस्मिता बीज  ।।          ।।६।।

 

नित्यतेचा वाम पंख।

सव्य उभारला निष्कलंक।

निष्पन्नतेचे कौतुक।

ऐसा हा व्योम विहार  ।। ।।७।।

 

व्योम रूपलें देह कणीं।

तेथ शब्दमण्यांची निर्झरणी।

कलतेची काल सर्पिणी।

तेथ फूत्कारे  ।।          ।।८।।

 

विश्व पिण्डाकाशलें।

पिंण्डाकाश अस्मदर्थे रंध्रले।

दश दिग् वायू गंधले।

नाद सौरभें  ।।          ।।९।।

 

नाद जान्हवी साकारली।

तेथ कृष्ण कमळें प्रतिबिंबली।

जीं आंतर व्योमी केसरली।

समाधि भावे   ।।          ।।१०।।

 

नाद मेघें चित्तारिलें।

घट व्योम शोभिभलें।

आदेश - दंडे विघटलें।

महानाद ऐका  ।।          ।।११।।

 

कोटि विश्वांचा चक्काचूर।

प्रलय-स्फुल्लिंगांचा काजळलेला धूर।

स्मशान रक्षेचा महापूर।

विश्व राज कोसळला  ।। ।।१२।।

 

जय जय! प्रलय पतये रुद्रदेवा!।

आपुला त्रयोदशनेत्र उघडावा।

द्वादश मिटावा।

एकादशीं ।।                    ।।१३।।

 

पुन: सृष्टिचा संभार।

निरंशतेचा पूर्णाकार।

महाभूतांचा लघुव्यापार।

नाद बिंदुभूतला   ।।           ।।१४।।

 

विश्व सलिलाचें घनदर्शन।

वैश्वानराचे स्फुल्लिंग कण।

विराज तत्वाचें रेतधन।

बिंदुमूर्ति  ।। ।।१५।।

 

गोविंद भावाची मध्य वृत्ती।

गोरक्षप स्थितीची आदिस्फूर्ती।

अतीततेची नग्न मूर्ती।

घन वठलि बिंदुरूपे   ।। ।।१६।।

 

जीव भावांची मांदियाळी।

महेशपदिंची चित्पादधूली।

जाणिवेंत प्रस्फुरली।

तव कृपा महाबिंदो ।।          ।।१७।।

 

महा बिंदूचा रूप भागा।

त्या अभिधान चंद्रभागा।

तेथ रूपल्या पांडूरंगा।

व्योम हस्तें आलिंगी  ।। ।।१८।।

 

तेथल्या पांडुरंगाचा श्वेतरस।

चोखितां अवृत्तिक उल्हास।

आणि इंद्रायण तेजो भास।

तेथचि दिसे  ।।          ।।१९।।

 

बिंदु रुपतां उगवे वृत्तिचंद्र।

गुह्यांकन त्या नांव इंद्र।

त्या इंद्राचे नीलनीरांत अयन।

ज्ञानेश्वरले निवृत्तिरूपें  ।। ।।२०।।

 

‘बिंदु’ हेंचि निवृत्तिपद।

रुपज्ञानाचा पडसाद।

ज्ञान ईश्वरत्व आगाध।

निवृत्ति ज्ञान  ।।          ।।२१।।

 

हिरण्य तेजाचें अधिष्ठान।

दृक् शक्तीचे चैतन्यस्फुरण।

मंत्र मूर्तींचें अनिमेष ध्यान।

निवृत्ति-ज्ञान दोन नेत्र  ।। ।।२२।।

 

मणिपूरीं लकाके बिंदू।

कल निष्कलाचा अनुसंधू।

व्योम तेजाचा ऋणानुबंधू।

पांडुरंग भाव  ।।          ।।२३।।

 

श्वेत वृत्तीचा परम वोघ।

त्यांत जीव नाहाती नि:संग।

तयां भुलविती धनुष्यरंग।

सप्तवृत्तींचे  ।। ।।२४।।

 

तेथ जीव बोलकें भेदरतीं।

सलिल पृष्ठीं थैमानतीं।

व्योमपवनें गुदमरति।

भय प्रद ही श्वेत मुद्रा  ।। ।।२५।।

 

दूरदूर ऐकली हाक।

नाद सुधें या चित्तदेहा मारव।

जय गिरंनार! जय अलख।

आदेश घ्या! ।। ।।२६।।

 

ओष्टांत आलि हिरकणीं।

श्रुतिरंध्रीं स्फुरली विदेहवाणी।

श्रुतिग्रंथी तुटली महा व्योम मनीं।

‘कानफाट्या’ झालो मी  ।। ।।२७।।

 

विषग्रास अमृतलें।

अंश देह तेहिं पूर्णले।

‘स्मशान’ लता पल्लवले।

जीवरूपे   ।। ।।२८।।

 

कलता कल्पनेंत विरली।

कल्पना भ्रांतीरूपें आविर्भवली।

अवस्थातति निरवस्थाली।

संधान समाधलें  ।।          ।।२९।।

 

रूपांचे कोटिदर्शन।

एक बिंदूचें अनंतज्ञापन।

जणुं सद्गुरूचें अध्यापन।

शिष्यमुखें  ।। ।।३०।।

 

अस्मितेच्या प्रांगणीं।

बागडले जे किरणमणी।

तयांचा तूं वासरमणी।

सखे! रूपते   ।।         ।।३१।।

 

रूपतेचे गर्भागार।

तेथ दृश्य श्रेणीचा विस्तार।

द्रष्टृत्वाचा मुलाधार।

रूपलेली बिंदुता  ।।         ।।३२।।

 

परि साक्षित्वाचें सौभाग्यस्फुरण।

गोवृत्तींचे रक्षनाथन।

सोहंवृत्तींचें निरंजनन।

जय! अलखादेश!  ।।         ।।३३।।

 

जय जय! अमरौघा आदेशा!।

आंतर व्योम्नीच्या शब्दप्रकाशा।

चिद्गंगेच्या ओसंडल्या कलशा!।

स्थिरे येथें   ।।         ।।३४।।

 

तूं अर्थ कोटींचा स्फोट।

तूं आशिर्वचनांचा लोट।

तूं श्यामरंगाचा कोट।

अभेद्य तू   ।।          ।।३५।।

 

तुझ्या प्रहारें हिरण्यगर्भ भग्नला।

तुझ्या विस्तारे ब्रम्हभाव नग्नला।

तुझ्या आधारें नादभाव गगनला।

जीव महेशला तुझ्या कृपा   ।। ।।३६।।

 

महेशपदांचा अन्वय।

समाधिभावांचा शून्यलय।

अवस्था भेदांचे तुरीय।

अतीत पंचम स्वयंतूंचि   ।। ।।३७।।

 

गं बीज स्फुरलें तवोदरी।

हं बीज स्थिरलें तवाक्षरीं।

रं बीज पिकले सर्वतोपरी।

जय जय! मंगलमूर्ते!   ।। ।।३८।।

 

‘अ’ नाम अन्वय।

‘उ’ नाम व्यतिरेक।

‘म’ नाम अभिषेक।

मांगल्याचा    ।। ।।३९।।

 

सख्या! आदेशा! ॐकारा!।

ज्योति विश्वीच्या रत्नाकरा।

अलक्ष्यबीजाच्या आकारा।

निष्कला! निरंजना  ।। ।।४०।।

 

अमृत स्नात चतुर्देह।

व्योमी विस्तरलें निजगेह।

जीवन्मुक्ति तूं विदेह।

शब्दसख्या   ।। ।।४१।।

 

शब्द रत्नांचे संपुट।

आणिलें तुझ्यासाठीं निवट।

देहपुरीचा स्वानंद मठ।

तुझ्यासाठी स्थापिला   ।। ।।४२।।

 

अलखगृहींच्या अतिथे।

तेज: शैलीच्या सुवर्णमूर्ते।

श्रुति गुहेंतील आदिनाथें।

धाडिलें तुला   ।। ।।४३।।

 

कलतेच्या मंडपीं तुझें आसन।

कल्पेनेच्या गंगेत तुझें स्नान।

भ्रांतिभावाचें दर्शन।

तुझ्या नेत्रा   ।। ।।४४।।

 

स्वस्ति! अलक्ष्या! मूर्तिभंजका।

पालवी निष्पन्नतेच्या पंखा।

आज आदेश सखा।

आलिंगला  ।। ।।४५।।

 

अनंत विश्वांचें विराजरेत।

महेश मानसिंचा ब्रह्मपुत्र।

परमव्योमींचा निश्चक रथ।

आदेश अतिथि  ।। ।।४६।।

 

सहजतेच्या सहस्त्रारीं।

नादगंधाच्या उन्मत्तलहरी।

कैवल्य बुद् बुद तरंगे त्यावरी।

अतिथि सखा हा   ।। ।।४७।।

 

स्वस्तिमूर्ते! ‘स्वस्ति’ शब्दा।

परमव्योमींच्या निष्पंदा!।

नील कमलिंच्या सुगंधा।

‘भद्र’ शब्दा  ।। ।।४८।।

 

आज देवांनीं ‘भद्र’ ऐकलें।

ऐकतां श्रुतिकाय चौभंगले।

स्वयं अतीतत्व संगलें।

‘इत’ त्वाशीं   ।। ।।४९।।

 

पिंजरूनी नि:श्वास विश्व।

धवलिलें श्रुतिमंत्रपुष्प।

‘ऋतं सत्यं’ हि सर्वस्व।

मूर्तलें या अतिथींत  ।। ।।५०।।

 

येथ ध्यानले अलक्ष्य!।

साक्षित्व झालें वृत्तिसाक्ष्य।

विश्वेदेवांचें आशीर्लक्ष्य।

पडलें माथा   ।। ।।५१।।

 

चिद्जलींच्या तळीं रुतलें।

चिद् गगनींच्या पृष्ठीं झुंबरलें।

चिद्वायूच्या शिरीं शोभलें।

सौरभालक्ष्य    ।। ।।५२।।

 

स्वस्तिश्रिये! कल्लोलिनी।

जय! ‘लोलिहाना’ स्वरूपिणी।

शुभ्रशिखे शून्य विलोलिनि।

आदेश माये  ।। ।।५३।।

 

जडतेंत मुळलेलें चैतन्य।

ज्ञान वृत्तींतील निवृत्तिज्ञान।

नाथ तत्वांचे शब्दवाहन।

व्याकृती तव आदिनाथा!  ।। ।।५४।।

 

चतुर्देहाच्या राखेची चिमुट।

शून्यवृत्तीच्या चौपदरींत टाक।

अतीतत्वाची घाल भीक।

अतिथि हा दारीं उभा  ।। ।।५५।।

 

सख्या अलखा! तुझ्या निष्कलदेहीं।

क्षण एक दोन राहुंनामी।

निज सत्तेच्या श्यामधामीं।

पहुडतो जरा  ।। ।।५६।।

 

हांक तुझी प्रत्युरलों।

भाक तुझी पुन: स्मरलों।

पूर्ण देव मी स्मरलों।

तुझ्या व्योमीं    ।। ।।५७।।

 

कूर्म नाडींत स्थिरावें।

चित्तवृत्ति स्वस्वरूपानें।

सापेक्षतेनें कैवल्यावें।

अलक्ष्यगर्भी    ।। ।।५८।।

 

प्रमातृ चैतन्याची चेतवणी।

प्रमेय चैतन्याची भाववणी।

प्रमाण श्रेणींची उभारणी।

नाथवली आदेशानें  ।। ।।५९।।

 

सख्या अतिथे! बैस येथें।

तुझें माझें सांग नातें।

कोटिजन्म संस्कार फुलते।

आज झाले  ।। ।।६०।।

 

तुझ्या नादें चतुर्देह कर्णले।

तुझ्या हस्तें अदृश्यभाव वर्णले।

तुझ्या पदजलें मृददेह स्वर्णलें।

नि:शब्द झालो  ।। ।।६१।।

 

हृदय संपुटीं सांडलेला शब्द।

अंतरात्मजलीं उठविलास जो बुद् बुद्।

अत:पर त्याचेच पडसाद।

ऐकेन मी    ।। ।।६२।।

 

साक्षात्कृत हें सारस्वत।

मूर्तलेला हा नाथ पंथ।

सेवीन, वंदीन कोटिजन्मशत।

अजातरुपें ।। ।।६३।।

 

जडा जडा ज्ञेयाज्ञेय।

इष्टानिष्ट त्याज्य ग्राह्य।।

त्वन् मम भूत भाव्य।

जें जें माझें ।। ।।६४।।

 

तयाची निरंजित नीरांजनें।

ओवाळिली, देखिली तुझ्या नयनें।

अनंत देहि कोटि गगनें।

प्रकाशलीं   ।। ।।६५।।

 

अलक्ष्य स्थिरावलें कूर्मांत।

कूर्म सोडिले मध्यमेंत।

विरूपलें, पुन: सृष्टले तेथ।

अनुभव बीज हें  ।। ।।६६।।

 

प्राण सख्या! अतिथे!-धरि अंगुलि।

पश्यंति भूमिकेंत दृष्टी भेदरली।

पुढें न जाई, तेथली ओळखण अवतरली।

संस्कार पांखरे भुरभुरली   ।। ।।६७।।

 

परिक्षणार्धी निश्चेष्ट झालींचरण तीर्थेंा।।

स्वस्ति सोभाग्या! चरणतीर्था।

तूंचि साक्षात् बिंदुस्वरूपता।

जेथ अवनता। परमागति   ।। ।।६८।।

 

सखे अतिथि! तूंचि तीर्थंकर।

तूंचि अनुभवसूर्य भास्वर।

चित्तसामाचा आरोह स्वर।

अलखा तिथें  ।। ।।६९।।

 

अनंत चरणे पूजिलीं।

अनंत देवे प्रार्थिलीं।

अनंत संतें मिराविलीं।

माथां मियां   ।। ।।७०।।

 

आज त्यांचा आशीर्देह।

अवतरला अन नि:संदेह।

होवोनि उघडिलें निजगेह।

अतिथि सख्यासि   ।। ।।७१।।

 

सर्व देव महादेवले।

सर्व भाव नाथावले।

सर्व गांव सामावले।

श्यामपुरींत या!    ।। ।।७२।।

 

स्वस्ति! महाभागां! अतीत ब्रह्मा।

पुनरागमनाय यथेष्ट जावें गा।

कृपामात्र दृष्टिरूपा! नि:संगा।

तुझाच मी!   ।। ।।७३।।

 

लय साक्षितेचा गौरिशंकर।

साक्षिता उमा, लय उमावर।

तयाचें सोमतेज प्रखर।

अवलोकिले आज!   ।। ।।७४।।

 

गौरीशंकर गिरनारला!।

आदिनाथ धुंडिराजला।

आदेश क्षणैक शब्दला।

आणि स्थिरला येथें  ।। ।।७५।।

 

पहाक्षणैका ! काय तुझें वैभव।

डोळिलें तुझ्यांत स्वरूप शांभव।

जय स्वस्ति! कर्पूर गौरभाव।

सुखेनैव नि:शेषलों मी   ।। ।।७६।।

 

स्थिरै: अंगै: आश्लेषिलें।

चतुर्तनुभि: आवेष्टिलें।

चतुस्तत्व प्रतिबिंबले।

आदेश शब्दीं   ।। ।।७७।।

 

अहा ! ती शब्द सरस्वती।

तियेसी माझी कोटि प्रणती।

निस्तब्ध अचलागति।

आदेश माता !  ।। ।।७८।।

 

`प्रभात' याचें नाम।

`संभात` याचें ग्राम।

'विभात' याचें धाम।

आदेश राज हा  ।। ।।७९।।

 

पंचप्राण सन्मुखलें।

चतुर्थदेह निर्मुळले।

कोटिजन्म सफळले।

कूर्मनाडि स्पर्शें   ।। ।।८०।।

 

कूर्मनाडींत बिंदु आरोपण।

नयन ज्वालेंत दीप्ति समर्पण।

शिरोमध्यांत वितरण।

गुह्यभावाचे  ।। ।।८१।।

 

ध्यावयासी येई तो अतिथी।

निर्मुळविणें या नांव संतति।

अतिब्रह्मणें ही शून्यस्थिति।

नाथनाद राजगुह्य  ।। ।।८२।।

 

बीजलेला अमृतानुभव।

व्योम जिव्हीं चाखिलेला नाद रव।

अल्प दृष्टलेला हंसभाव।

खुणावी पराचंद्रिका!   ।। ।।८३।।

 

चाललो, धावलो, बहकलो।

भक्ति प्रेम जलांत डुंबलो।

श्यामलेच्या सौंदर्यरंगीं रंगलो।

नमस्ते! अतिथें!   ।। ।।८४।।

 

वस्तु आकार इंद्रियले।

इंद्रियआकार चित्तावले।

चित्त महत्तवलें।

महत् अस्तवलें अस्मदर्थी  ।। ।।८५।।

 

अस्मद्र्थाचें मयूरासन।

तेथ स्थिरलें आदेशदर्शन।

आदेशीं व्यक्तलें अलक्ष्यकिरण।

फांकली किरण प्रभा   ।। ।।८६।।

 

झोळंबलें आंतर वितान।

तेथ माजलें नक्षत्ररान।

प्रतिध्वनलें शब्दाधान।

हेमगर्भधारणा चित्कलेची   ।। ।।८७।।

 

चित्कले! निष्कले! कलावती।

वृत्ति विश्वाची समुन्नती।

साक्षितेची पूर्ण व्याप्ती।

त्रिपुटीचे मंदिरीं   ।। ।।८८।।

 

मंदिर त्रिपुटींचे उभारलें।

तेथ अधिष्ठानीं अवस्थात्रय खचिलें।

सुषुप्ति सौख्य कळसलें।

स्वस्ति वाचन सख्या!तुला   ।। ।।८९।।

 

जाग्रदवस्थेचे प्रकट अनुभव।

हा सुषुप्त्यवस्थेचा लीला खेळ।

स्वप्न जागृतीचा बिंबभाव।

त्रैलोक्य सुंदरीची प्रसाधना   ।। ।।९०।।

 

सुषुप्तिमायेच्या अंकावरी।

पहुडली अवस्थात्रय-सुंदरी।

परि सुषुप्तीस आधारी।

चतुर्थचंद्र   ।। ।।९१।।

 

अवस्थे अवस्थेंत त्रैलोक्यत्व।

पुनर् अवतरे अवस्था भिन्नत्व।

स्वप्नांतरींचें सुषुप्त्त्व।

गुलाब पुष्प   ।। ।।९२।।

 

स्वप्नरंगांची रक्तता।

सौषुप्तची पीतता।

तुरीयतेची विशुभ्रता।

या नांव गुलाब पुष्प   ।। ।।९३।।

 

येथील निर्वण सौगंध  ।

हुंगिता भ्रूनेत्र  झाला अंध।

शून्यास्ति वृत्तिद्वय भावलें निष्पंद।

सुषुप्ति सखा! गुलाब हा   ।। ।।९४।।

 

अंतर् विश्वाचा भव्य विस्तार।

बाह्य विश्वाचा मूल आधार।

शून्य सत्याचा भाव निराकार।

या नांव लयद्रष्टत्व   ।। ।।९५।।

 

शून्य लयांची तिरोगति।।

नील पुष्पांची रंग - संगति।

या नांव स्वप्न - सुषुप्ति।

स्वस्ति श्रिये! सुषुप्ते  ।। ।।९६।।

 

अरुपलेला तुरीयभाव।

रुपलेलें अश्राव्य नांव।

शामलेचा सौंदर्य भाव।

अलक्ष्याची निरंजनता   ।। ।।९७।।

 

जय! अलखाधीश मी! आदेश!।

शून्य वृत्तीचा अभिनिवेश।

महेश दीप्तीचा तेजोलेश।

स्फुरलों येथें ।। ।।९८।।

 

गिरनारदेशीं स्फूर्तलो।

ॐ कार शब्दीं मूर्तलों।

तुरीय भावीं पूर्तलों।

पंचम मी! आदेश  ।। ।।९९।।

 

गंगावतरण यमुनेंत।

सत्ववृत्ती शामशून्यांत।

तुरीय सुषुप्ति कोशांत।

प्रफुल्लले गुलाब पुष्पें ।। ।।१००।।

 

तेथिंचे सुगंध देह।

व्यापिती व्योम गेह।

किरणते महेश्वरीय।

सुखेनैव संचरती   ।। ।।१०१।।

 

किरण बिंबला अचानक।

संदेश  सदेहला एक।

पंचमावस्थेचा आलेख।

व्योमांगुलीस स्पर्शला   ।। ।।१०२।।

 

महन्मंगले! व्योमांगुली!।

क्षणेक प्रभा तव झांकोळली।

परि पुनरवे उन्मेषली।

सुषुप्ति प्रभा   ।। ।।१०३।।

 

आणि बहरलें नवल गुज।

उन्मेषली प्रलयाची साखरनीज।

निरंजनतेची पुष्पशेज।

गुलाब राजा   ।। ।।१०४।।

 

तेथ व्यक्तला आनंदरस।

तेथ फुलेला पंचम कोष।

तेथ अलक्ष्यभावाचा उद्घोष।

स्वस्ति! आदेश वायो!    ।। ।।१०५।।

 

विश्वभाव सहज व्योमला।

अवतरली सहजता श्यामला।

मृत्युदेह अमृतला!।

चंद्रिका पानें   ।। ।।१०६।।

 

स्वस्ति दे! स्वस्तिदे! चंद्रिके सोमप्रभे!।

व्यष्टिभावाच्या निलंनभे!।

परमेष्यि-समष्टिच्या गर्भे।

नमोsस्तुते! नमोsस्तुते!   ।। ।।१०७।।

 

आमचा पत्ता

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