उन्मनी वाङमय

१८ सप्टेंबर १९३८

१८ सप्टेंबर: 

एकूण २२ श्लोक

 

स्वस्ति श्रिये! स्वस्ति श्रिये! शब्दतरले।

स्वस्ति! घटाकाशीं मेघमणि ओघळले।

आंतरिचें सुवर्णसूत्र स्थूलावलें।

स्थूलांत पुनराविष्कृत झालें मध्यपुष्प  ।। ।।१।।

 

घट नादांत विरलें तत्वरूप।

नाद घटांत स्थिरले बिंदुधूप।

बिंदुसौरभीं निरलें श्रीभूप।

जय जय ! श्री भूपा  ।। ।।२।।

 

सहस्त्र संवत्सरांच्या कमलीं।

सौरभरूपें श्रीनाथ विद्या विखुरली।

तेथलीं पुंपरागें अप्रतिहत संचरली।

जीव कमलिनी पोशी   ।। ।।३।।

 

जीव तत्वे आमुचें क्षेत्र।

सूक्ष्म सृष्टी आमुचें तंत्र।

कारण लोक आमुचा मंत्र।

`श्रीभूप' हें महाकारण   ।। ।।४।।

 

जय जय! महा कारणा श्रीभूपा!।

`क्लिं' बीजाच्या व्यक्त रूपा।

येथ सगुणवी तुझी कृपा।

श्रीविद्येंत   ।। ।।५।।

 

जय श्रीभूपा! (येथ) हेंच तुझें पीठ ।

श्री सुषमा येथ पसरे घनदाट।

येथ मोक्ष लक्ष्मीचा श्रुंगारथाट।

भोगुनि घ्या श्रीभूपा! ।। ।।६।।

 

श्रीविद्येची शीतल चंद्रिका।

घंटाकाशांत उभारी कौतुका।

देहघटांतिल सांकलेल्या आत्मसुखा।

श्रीभूप वितळविती ।।         ।।७।।

 

श्रीभूपांचे हे गर्भागार।

श्रीविद्येचें हें माहेर घर।

श्री जान्हवीचें मानस सरोवर ।

येथ श्री गंगोत्री   ।।         ।।८।।

 

ओळख श्रीभूपांची पाउलवाट।

`साक्षात् कुरू' श्रीभूपांचे तेजविराट।

`नमस्कुरू' श्रीनाथ वैभव अफाट।

श्रीविद्या येथ तेजाळली  ।। ।।९।।

 

स्थूलास श्रीभूपें भेदिलें।

सूक्ष्मास श्रीभूपें छेदिलें।

कारणास श्रीभूपें वेधिलें।

श्रीभूप महाकारण  ।। ।।१०।।

 

महाकारणाचा प्रवाह हाच।

हाच श्रीविद्येचा चितिदेह त्या देहास।

चिंत्य व्यक्त भाव।

देतील श्रीभूप  ।। ।।११।।

 

श्रीभूपांचा भूपोत्तम।

स्थिरला तेथ त्याचें निजधाम।

निष्कामाचें इतुकें काम।

येथ प्रफुल्लेल  ।। ।।१२।।

 

श्रीविद्येचा विद्यापति।

अष्टांगांनीं तया प्रणती।

ज्याच्या मंत्र देहांची संतती।

स्फुरणार येथें  ।। ।।१३।।

 

श्रीविद्येचे हें नाथ कुटिर।

येथ द्वादश सूर्य झाले स्थिर।

येथ व्यक्तावलें गिरिनार शिर।

गुह्योत्तम सांभाळ हें ।। ।।१४।।

 

जीव कलिकांचा बाग बहरला।

भाव भ्रमरांचा संघ संचरला।

श्रीविद्येचा सौरभ दरवळला।

कारण व्योमी   ।। ।।१५।।

 

श्री, श्रीभूप यांचा विवाह।

धी, धीरूप यांचा अंत:स्नेह।

ऱ्ही ऱ्हीस्वरूप यांचा युक्तदेह।

महन् मंगल हें!  ।। ।।१६।।

 

कारण तत्वाचें मंगलसूत्र।

सूक्ष्मताचें विरल महावस्त्र।

स्थूलांचें याज्ञिक तंत्र।

श्रीभूपाचें पाणिग्रहण हें  ।। ।।१७।।

 

आतां भग्नले अंतरपाठ।

आंतर व्योम्नीं महाकारण दीपले संराट।

स्थूल सप्त्कांत फुटली नादवाट।

मंगल वादन हें   ।। ।।१८।।

 

जीवाचे अष्टभाव उन्मळले।

विश्वाचे अष्ट दिक्पाळ मालवले।

महाभक्तिचे अष्टगंध दरवळे।

ऐशीं हीं मंगलाष्टकें     ।। ।।१९।।

 

श्रीवधूची हिरवी साडी।

नाथ हस्त हळुवारें फेडी।

श्री - श्रीपतीची ही लग्न घडी।

महाकारण - मंचकी! ।।२०।।

 

श्रीविद्येचा कर्पूर गंध।

श्री श्रुतीचा सावित्री छंद।

श्रीनाथ भावाचा संचार स्वच्छंद।

सिद्धिगुहेंत या!   ।। ।।२१।।

 

 

जय जय! सिद्धिगुहे! व्योम देहिनी!!।

परात्पराच्या परमवंद्य गेहिनी!।

आदिमाते! श्री विद्यापीठ स्वामिनी!।

येथ मी पहुडतो!   ।। ।।२२।।

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