उन्मनी वाङमय

१५ नोव्हेंबर १९३८

१५ नोव्हेंबर: 

एकूणा श्लोक: २०

 

सकाळी ०९.००

 

विकार केंद्रें नका आच्छादूं।

स्वयंपूर्ण संवित् नका संबंधू।

रजतस्वप्न हें नका तुम्ही रंध्रूं।

अहंवृत्तीच्या शलाकेनें!  ।। ।।१।।

 

उन्मादक हा चंद्रिकारस।

महाजीवनाचें पिसाट साहस।

लौकिक जागृतीला विषग्रास।

स्वप्नस्थितींत या   ।। ।।२।।

 

हिरवें विष हें ‘पिंगला’ दंशाचें।

स्मशान रक्षा ही अंतर्व्योम्नीनाचें।

प्रेत कीं  व्यतिरेक-व्यवहाराचें।

पुनर्जीवे विषस्पर्शें!  ।। ।।३।।

 

जांभळया होऊं द्या नसानसा।

विषबाधेचा आदरा हा संपूर्ण ठसा।

अहंवृत्तीस नाग दंशें डसा।

‘नाग’ म्हणजे प्रज्ञास्फुरत्ता!    ।। ।।४।.

 

अनेकजन्मीं झालो ‘शहाणे शहाणे’।

आता क्षणैक ‘पागल’ होऊनी पाहणें।

जग जगूनी थकलो क्षणैक आतां मरणें।

भोगूं या महानंदी!  ।। ।।५।।

 

पाह पाहिली विणलेली दृष्टी

क्षणैक अंधवू या माजलेली दृष्टी।

भिजभिजलो पावसांत, क्षणैक अग्निवृष्टी।

त्वग् देहास आलिंगवू!  ।। ।।६।।

 

सकाळी ०९.२९

 

‘अन्नादे’ ची अनुभविली आशीर्वचनें।

परि आज जठरें लिंपूं भस्म धुलीनें।

मातकणली सुदैवें अष्टावसुधनें।

प्रयोग हा स्वेच्छिलेला!  ।। ।।७।।

 

जय श्रिये! अकिंचन ते विभव विशेषे।

वसुश्रेष्ठे! वसिष्ठे। धुलि वेषे।

आर्ति देहे दु:खाश्रु स्वरूप प्रहर्षे।

विराग विभवे! नमन तुला!  ।। ।।८।।

 

मणी मणी फेकूनी संपवू निधी।

मोती मोती हुडकू दरिद्रवू उदधी।

कमल कमल खुडून स्वच्छवूं नदी।

विराग विधान आचरूं हें!    ।। ।।९।।

 

सम्राट ओळखूं भिकारडयांत।

राज्यश्री सांभाळू ‘मृत्तिका’ प्रसादांत।

महामोद अनुभवूं स्वपर वेदनेंत।

विराग विधान हें आचरूं   ।। ।।१०।।

 

पात्रान्न वोपूं अतिथीचे मुखी।

‘समानाश्रू’ होऊं अश्रुलांचे शोकीं।

स्वर्गमार्ग देखूं जेथ पतित पातकी।

तिष्ठले कर्मविपाकें!  ।। ।।११।।

 

न व्हा वैभव कर्दमींचे किडे।

न मिरवा नटलेले फाकडे।

क्षण सफेतलेले अजाण बापडे।

खलनायक शोकांती! ।। ।।१२।।

 

नाट्यांत नका देखू वस्तुता।

राजकीयांत नका मानू सत्ता।

लौकिकांत केउती परमार्थता!।

“ ‘लोकविरूद्धं’ तदेव शुद्धम्”!  ।। ।।१३।।

 

दिगंबर आम्ही महावस्त्रांकित।

अकिंचन आम्ही सर्व श्रियालंकृत।

कारटे आम्ही श्रीवंश परंपरागत।

“ ‘लोकविरूद्धं’ तदेव सत्यम्”!  ।। ।।१४।।

 

आमुचा निखारा पल्लववील वठेल वृक्ष।

आमुचा वेध स्फुटवीन उत्थान पंख।

आमुची कुऱ्हाड सावरील मोडता मंचक।

“ ‘लोकविरूद्धं’ तदेव शुद्धम्”!।। ।।१५।।

 

जेथ जेथ दिसेल उन्मत्त सत्ता।

तेथ तेथ वावरे ठेचाळणारी लत्ता।

महावस्त्र आमुचें दारिद्र्य कंथा।

“ ‘लोकविरूद्धं’ तदेव शुभम्”!!  ।। ।।१६।।

 

‘निरक्षर’ आम्ही लीलया ठेचणार।

विद्वत्प्रतिष्ठेचे फुगलेले आकार।

पढत गर्दभांचा शास्त्र संभार।

लाथाळूनि देऊ!  ।। ।।१७।।

 

थोरा थोरा शास्त्रज्ञांचा संमर्द।

मोठ्या मोठ्या मनन मूर्खांचा संवाद।

मर्कटलेल्या शब्दगोंधळयांचा उन्माद।

वमन वत् त्याज्य आम्हा!  ।। ।।१८।।

 

आम्ही चाखू जीवनाचे सहजकल्लोळ।

आम्ही बोलूं महानुभूतीचे ज्वलंत बोल।

आम्ही प्रगतवू फुलल्या चिद्भानाचा हिंदोल।

नव बालक मी - आम्ही!  ।। ।।१९।।

 

मत्स्य मी महाजीवनीं मिळलेला।

अवधूत मी आदिवंशीं कुळलेला।

मी श्री वृक्ष शीर्षीं फळलेला।

तीर्थ देह प्रकाशक!  ।। ।।२०।।

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