उन्मनी वाङमय

२० नोव्हेंबर १९३८

२० नोव्हेंबर: 

एकूण श्लोक: ५१

 

मध्याह्न १२.००

 

वासना- स्वप्नाचें उपादान कारण।

जीवचिति केन्द्र-निमित्त कारण।।

येथलें वायुद्वय कूर्म उदान।

स्वप्न स्थितीची घटना ऐशी   ।। ।।१।।

 

विशुद्धि चक्रांत याचे स्पंदन ।

षोडश दलांचे जेथ संकलन।।

सुवर्णपुरी द्वारकेचें उत्थान।

एकस्तंभा प्रतीक स्वप्नस्थितीचें  ।। ।।२।।

 

कामसंस्काराचा एक स्तंभ।

तयावरि आधारे स्वप्नविश्व बहुरंग।।

मध्यमा वाणीचा उत्संग।

स्वप्नबाला जेथ पहुडे  ।। ।।३।।

 

स्वप्नमाधवी बहरतां हळुवार।

बोथटते प्रत्यक्षतेची धार।।

स्वाच्छन्द्य्राचा अनिरूद्ध संचार।

संभवे दिक्कालातीत  ।। ।।४।।

 

कालपरिमाण तेथिचें अलौकिक।

आणि स्थलमान मूर्तले कीं नवकौतुक।।

जीवचंडोल उभवी रजतपंख।

स्वैर उडे वासनाव्योम्नीं   ।। ।।५।।

 

प्रतीती येथल्या पदार्थजन्या।

परि पदार्थ, प्रतीतीहूनि न अन्या।

जागृतीचे संस्कारलेश पुन: पूर्णत: प्रत्यविण्या।

कामकामी जीव, स्वप्नस्थ  ।। ।।६।।

 

मध्याह्न १२.२०

 

क्वचित् कदाचित् जीवचेतनेच्या स्वप्नमंदिरीं।

अवधूत अवतरती आदेशशरीरी।।

क्षणैक बहरविती महाचितिची विद्युत् वल्लरी।

वनमाळी हे व्योमवनींचें  ।। ।।७।।

 

विशुद्धि चक्रांत वोपिती सुवर्णस्पर्श।

सूक्ष्म शरीरीं स्पष्टविती महा आदेश।

स्वप्न स्थितींत सन्मुखती लोक-मह-ईश।

गर्भधारणा येथ हेमतत्त्वांची   ।। ।।८।।

 

जागृदवस्थेचें मूल, अबोधगर्भ व्यतिरेक बुद्धि।

स्वप्नस्थितीचें रहस्य जीवा वासनांचा स्वैर संधी।

सुषुिप्त् ही साकारलेली स्वरूप विस्मृति।

व्याहृति या जीवस्वभावाच्या  ।। ।।९।।

 

व्याहृति म्हणजे वागुद्गार।

अवस्था हेच जीवभानाचे रूपाविष्कार।।

अत एव जणुं व्याहृति प्रकार।

असती ते जीवाख्य शब्दाचे  ।। ।।१०।।

 

जागरितस्थानो बहि:प्रज्ञ: सप्तङ्ग:।

वैश्वानर: एकोनविशंतिमुख: स्थूल भुक्।।

प्रथम: पाद: जाग्रद्व्याहृते: व्यतिरेक संङ्ग:।

चतुष्कलस्य जीवात्मन:।। ।।११।।

 

स्वप्नस्थानो अन्त:प्रज्ञ: सप्तंङ्ग:।

एकोनविंशति मुख: तैजस: प्रविविक्तभुक्।।

द्वितीय: पाद: स्वप्नव्याहृते: वासनासङ्ग:।

चतुष्कलस्य जीवात्मन:।। ।।१२।।

 

मूर्धादी सप्तंङ्गे म्हणजे सप्तंङ्ग  ।

इंद्रिय दशक प्राणपंचक करणचतुष्टय।।

हाच जीवकेन्द्राचा एकोणीस मुख संघ।

गूढ शब्दांची विवरणा ही  ।। ।।१३।।

 

सुषुप्त्स्थान एकीभूत: प्रज्ञानघन।

चेतोमुख: प्राज्ञ: आनन्दभोजन:।।

तृतीय: पाद: सुषुप्त् व्याहृते: विस्मृति सङ्ग:।

चतुष्कलस्य जीवात्मन:  ।। ।।१४।।

 

दुपारी ०१.०५

 

अदृश्यं अव्यवहार्यं अग्राह्यं।

अलक्षणं अचिन्त्यं अव्यपदेश्यम्।।

एकात्मप्रत्ययसारं प्रपंचोपशमं शान्तं।

तुरीयावस्थस्य जीवस्य स्वस्वरूपम्  ।। ।।१५।।

 

भूव्याहृति जाग्रदवस्था।

भुव:, सुवर्-स्वप्न, सुषुप्त।।

मह: ही तुरीयस्वरूपता।

जीव केन्द्र चितिची  ।। ।।१६।।

 

जाग्रदवस्थेचा स्वामी ‘वैश्वानर’।

स्पप्नीचा ‘तैजस’ सूक्ष्मविषय भोक्तार।।

सुषुप्तीचा ‘प्राज्’' सहजानन्दकार।

तुरीयेचा निष्कल एकात्म प्रत्ययरूप  ।। ।।१७।।

 

अ, उ, म, या त्रिमात्रा।

जाग्रद् स्वप्न सुषुप्तवस्था।।

तुरीयज्ञापक प्रस्फुटार्धमात्रा।

प्रणवविद्या अवस्थार्थ दीपिका  ।। ।।१८।।

 

सुषुप्ति म्हणजे प्रगाढ निद्रा।

अबोधस्थिति ही मोहसुभद्रा।।

जीवोSहं भानाची उफराटी मुद्रा।

प्रलयलेला येथ अहंभाव  ।। ।।१९।।

 

सुषुप्तींत अखंडा मोदवृत्ति।

मूलचितींत जीवचितिची संगति।।

‘नाज्ञासिषम्’ भावार्थाची प्रत्यग् मूर्ति।

प्रत्यभिज्ञेचा कारणविशेष  ।। ।।२०।।

 

दुपारी ०२.०२

 

‘नाज्ञासिषम्’ म्हणजे मला नव्हते ज्ञान।

परि त्या अवस्थीं ‘मी’ चें अवश्यंभावि भान।।

एखीं ‘नाज्ञासिषम्’ वृत्तीचेंही असंभवन।

नेणिवेचा ज्ञाता सदैव जागा  ।। ।।२१।।

 

कोणी असेल्याविण जागृत।

‘मी झोपलों, नेणलों’ ही प्रतीत।।

कैसी कोणास व्हावी स्फूर्ती ।

अत एव अखंडजागृतआत्मरूप  ।। ।।२२।।

 

‘शिव: केवलोSहं सुषुप्त्यैक सिद्ध:’।

आचार्या देशोSयम स्वयं संसिद्ध:।।

यज्जीव: चितिलेश: तदबोध सन्नद्ध:।

नाज्ञासिषम्वृत्त्या स्वरूपाखंडार्थ ज्ञापक: ।। ।।२३।।

 

प्रत्यभिज्ञेचें कारकबीज।

जीवभानाची गाढ गाढनीज।।

अबोधनीं ज्या `स एवाहं' वृत्तिची वीज।

सदैव अन्तर्हितली॥ ।।२४।।

 

‘सुप्ते जागृतोहं’ इति संज्ञा।

चेवतां त्या नांव ‘प्रत्यभिज्ञा’।।

अभाव प्रत्ययालम्बनावृत्ति' जी निद्रा।

तेथ सूक्ष्म चिद्भावाची आलांबनावृति  ।। ।।२५।।

 

‘प्रत्यवमर्ष’ म्हणजे पुनर्विचार।

जागृताचा जो निद्रा विकार।।

तो अन्तर्धानतां नवजागरा समुव्दार।

त्रिबिंदू हे एक स्वानुभवाचे  ।। ।।२६।।

 

तीन पदरी हें यज्ञोपवीत।

मीं, ‘जागृत-सुप्त्-पुनर्जागृत’।।

अखंड स्वस्वरूपाचें हे त्रिबिंदु प्रमाण साक्षात्।

स्वत: सिद्ध स्वयं प्रकाश  ।। ।।२७।।

 

यज्ञोपवीताची या ब्रह्मग्रंथी।

प्रस्फुटे जी प्रत्यभिज्ञावृत्ति।।

प्रत्यभिज्ञेंत प्रत्यगनुभूति।

साक्षितत्त्वाची  ।। ।।२८।।

 

जागृदवस्थेंत जागृत् स्वप्न सुषुप्ति।

स्वप्नस्थितींत स्वप्न सुषुप्त् जागृति।।

सुषुप्तींत सुषुप्त् जागृत् स्वप्नस्थिति।

आंतरवस्था ह्या अवस्थे अवस्थेच्या   ।। ।।२९।।

 

नवावस्थांत एक सूत्रला सूत्रात्मा।

नवभावांत व्यक्तला कीं प्रेमा।।

नवदेशांत संचरला कीं एकधामा।

अखंड चिदैक्य नवनटलें  ।। ।।३०।।

 

व्यवहृतींत कर्मप्रतिकर्मांचें प्रकाशन।

व्याहृतींत कर्ममूल अवस्थाभानांचें परीक्षण।।

अवस्थाततींत सूत्राकारल्या चित्केन्द्रांचें दर्शन।

व्याहृति शास्त्र आलोचिता  ।। ।।३१।।

 

अवस्थात्रय साकारलें स्वस्वरूपांत।

व्याहृतित्रय मूर्तलें महर्जीवनांत।।

‘मह:’ व्याहृति निरवस्थ अनुभवांत।

अखंडार्थें व्यक्तली   ।। ।।३२।।

 

थांबवूं या तुष्टि संशोधन।

शीर्षवू या नि:स्वहेत जीवन।।

अनुभवू या निरवस्थ चिद्भान।

महर्व्याहृति ज्या नांव  ।। ।।३३।।

 

महर्व्याहृतींत सूत्रात्म्याचें दर्शन।

अनुभवा, परि नसूं द्या तें निर्गमन।।

अनिष्टा पासुनी भित्रें पलायन।

न भेटवील सूत्रतत्त्व  ।। ।।३४।।

 

अनिष्टें, दु:खें, दुर्दैव विलसितें।

सामोरूनि स्पष्टवा त्यांची अन्तस्तत्त्वें।।

हेत शोधन, पृथक्करण, प्रज्ञा किरणें।

करूनि ओळखा मूलानुभूति  ।। ।।३५।।

 

दुपारी ०३.३०

 

डोळिवणें जीवनजालाचा अधिष्ठानतंतु। 

जाणणे स्वस्वरूपाचा आद्यहेतु।।

शोधणें मूलानुभूतीचा मूळधातु।

या नांव व्युत्पत्ति- क्रिया   ।। ।।३६।।

 

शब्द म्हणजे उद्गार।

अनुभव म्हणजे अवस्थाविष्कार।।

धात्वर्थाचा वा अवस्थाधिष्ठानाचा साक्षात्कार।

या नांव व्युत्पत्ति विद्या  ।। ।।३७।।

 

शब्दमात्राचा शोधा धात्वर्थ।

प्रत्यवस्थेचा निरखा अधिष्ठान  हेत।।

धातु म्हणजेच अधिष्ठान साक्षात।

धारणा तत्त्व मूलाधार  ।। ।।३८।।

 

दुपारी ०३.४५

 

निष्कल निर्विकार निरंजन।

निरालंब निरवकाश निरंकन।।

निर्वृत्त निर्मयूख निर्निकेतन।

स्वस्वरूप हें अधिष्ठान धातू  ।। ।।३९।।

 

संध्याकाळी ०५.३०

 

निरवस्थ साक्षित्व ही व्युत्पत्ति।

महाजीवनाची मूलधातु स्थिति।।

व्याहृति विद्येची परिणति।

व्युत्पत्ति विद्येंत  ।। ।।४०।।

 

‘नर्ते स्याद् विक्रियां दु:खी।

साक्षिता का विकारिण:।।

धीविक्रिया-सहस्त्राणाम्।

साक्ष्यतोSहं अविक्रिय:’।। ।।४१।।

 

दु:ख म्हणजे एक विकृति।

साक्षित्वीं विकृती नुरे संस्थिति।।

बुद्धिविकार साक्षितेंत निरवस्थती।

साक्षित्व म्हणजे स्वस्वरूप  ।। ।।४२।।

 

‘दु:खी यदि भवेद् आत्मा।

क: साक्षी दु:खिनो भवेत्।

सुखदु:ख प्रमाता हि।

प्रबोध: निरवस्थित:’  ।। ।।४३।।

 

‘अतोन्यदार्ता’चीं संस्फूर्ती   ।

म्हणजे सोपाधिक अवस्थांची निर्यती।।

‘सद्’ इति अस्तिता मात्रा धातुचिति:।

व्युत्पत्ति विद्यया प्रदृष्टा  ।। ।।४४।।

 

समारूढ होऊन अधिष्ठानीं  ।

पुन: प्रकाशे स्वानुभूति जी किरण किरणीं।।

भावबुद्धि दिवृत्तींस यथामूल्य संयोजोनि।

व्यवहरे शीर्षावस्था  ।। ।।४५।।

 

शीर्षभूमि ही संव्यवस्थिति।

निरवस्थ जेथ स्वस्वरूपली महाचिति।।

नि:स्वरली निरूक्तली श्री महागीति।

निर्द्वंद्व अद्वैत सिद्धि ही  ।। ।।४६।।

 

‘पंच मिथ्यात्वें’ येथ स्वयंमिथ्यलीं।

अखंडार्थ लक्षणा स्वस्वरूपलक्षणली।

सुसत् संकर्में संवित् स्वागतीं सामोरलीं।

उत्तंस हा निरवस्थानाचा  ।। ।।४७।।

 

संव्यवस्थिति नव्हे शून्याकार।

संवित् स्पष्ट चितीचा तो महाविष्कार।।

महाजागराचा ऊर्जस्वल प्रकार।

अमृतानुभव स्वयं पूर्णतेचा   ।। ।।४८।।

 

खुलवी पुष्पाची पाकळी ।

प्रगटवी श्रेणी श्रेणीची सोनसाखळी।।

पाड जोती ज्योतीची कोजळी।

संविद् ज्वाला  भडकू दे  ।। ।।४९।।

 

शतस्फुल्लिंगांची ही शततारका।

संव्यवस्थित संपूर्णजीवनदृशा निरखा।

आणि अनुभवा कौस्तुभ कौतुका।

निरवस्थ स्वस्वरूपाच्या   ।। ।।५०।।

 

संध्याकाळी ०६.३७

 

नित्य दर्शन शततारकांचें।

विधान हें महाविकासाचें।।

अभिसिंचन श्री सर्वं कुशल वृष्टीचें।

प्रतिज्ञाता फलश्रुतिस्यिम्।। ।।५१।।

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