उन्मनी वाङमय

२६ नोव्हेंबर १९३८

२६ नोव्हेंबर: 

एकूण श्लोक: २२

 

संध्याकाळी ०६.३६

 

कला भुवन,तत्व ।

पद वर्ण मंत्र ।

ओळखा हे षट्पंथ ।

शं अवधूतांचे  ।। ।।१ ।।

 

पशु, वीर, दिव्य  ।

त्रिविध व्यक्तलें मानव्य।

काल, भव, आणि सर्व।

अवधूत - त्रय त्रयसंचालक  ।। ।।२ ।।

 

संध्याकाळी ०६.४३

 

पशूंनो! पूजा कालावधूत।

वीरांनो! ओळखा भवावधूत।

दिव्यांनों! नमस्कुरूत सर्वावधूत  ।। ।।३।।

 

संध्याकाळी ०६.५०

 

दिव्य दीप्तांस सर्वेश्वराचें पद श्री वैभव।

दिव्य हस्तास श्री-सर्वंकषाचा पद पद्मवर्षाव।

दिव्य श्रुतीस  श्री-सर्वभावनाचा संश्राव।

दिव्यता आज्ञेंत वोपिन्नली!!   ।। ।।४।।

 

सहस्र सूर्यांची एक ठिणगी।

सर्वसाम एकरागीं।

सहस्र सुखें उगमली एक भोगीं।

स्फुल्लिंग भरणी क्रिया विशेष हा!  ।। ।।५।।

 

आंतरव्योम्नींचें नक्षत्र।

‘भरणी’ प्रतीक हें संप्रदाय-श्रुत।

आज्ञाचक्रीं होईल उत्स्फूर्त।

‘सर्व’ च्या ब्रह्म सुवर्ण स्पर्शे!  ।। ।।६।।

 

सर्वभानाची या चंद्रकोर।

भाव प्रतिभा चरणीं नाचला कीं मोर।

संज्ञान वृष्टि संतुष्टला कीं चकोर।

‘सर्वंभान’ हें!।। ।।७।।

 

संध्याकाळी ०७.१३

 

अतिथींस डोळवा भानु किरण।

मृतींत खेळवा महाचितीचें स्फुरण।

सृतींत संचरवा धूतविद्यारत्न।

सर्वाज्ञा! ही! सर्वंकष भानाची ।। ।।८।।

 

अतिथीस असो या उत्थापन!।

व्यक्तेल येथ श्रीमहाकारण।

व्यष्टि तत्त्वाचें या दीधीतन।

आम्ही करूं!  ।। ।।९।।

 

संध्याकाळी ०७.१५

 

स्वस्ति! स्वागतम्! जीव विशेषा।

स्वस्ति! आशीर्मेघ धूतरजोवेषा।

स्वस्ति! विराग विभवोन्मेषा!

स्वस्तिवाक् ही तुला! तुम्हा!  ।। ।।१०।।

 

सर्वेश्वराची ही भान जान्हवी।

संकल्प स्फुल्लिंगें लोकत्रयांत वर्षवी।

स्थिरवी जीवनात धूत ध्रुव वैभवी!।

भान भास्वर ‘भरणी’ स्फुल्लिंग हे  ।। ।।११।।

 

स्वस्ति श्रिये! उग्रे! शून्ये! युवाने!।

नैर्ऋते! स्वभावस्फोटे! ईशाने!।

नव गार्हस्थ्ये! निवृत्ति स्फुरत्ते! अतिथिप्रेषणे।

नवात्मनि! नवनमस्या तुला!  ।। ।।१२।।

 

संध्याकाळी ०७.२२

 

उदीचि तारके! खुलव तुझा किरण किरण।

कूट तत्त्वस्थे! उभव तुझे शरण शरण।

नारायणि! स्पष्टवी तुझा रजत चरण।

धूत प्रतीक जें गुहागत!  ।। ।।१३।।

 

सर्वत्र वोसंडे धूत पद्मांची दृती।

श्यामोदधींतुन उद्वर्षली कीं मौक्तिकातती।

‘व्यवहृति’ भूमिकेंत सुरेखली कीं ‘व्युत्पत्ती’ ।

निरवस्थ स्वस्वरूपाची  ।। ।।१४।।

 

अवस्था विशेषांचा उत्तंस।

महर्त्याहृति ही सुवर्ण संवित्तीचा स्फुरत् स्पर्श।

निवृत्ति रूपाचा नव नारायण हर्ष।

सर्वंभानांत सासिन्नला!  ।। ।।१५।।

 

पंचक्लेश वृत्तींत निवृत्तला।

पंच विषय प्रवृत्तींत संश्रुतला।

पंच चक्रांत सहस्रारला।

श्रीस्फुल्लिंग प्रवेश  ।। ।।१६।।

 

शून्या, संवित् सूक्ष्मा।

मरा, पश्यंती, मध्यमा।

आणि वैखरी या सप्त्सुषमा।

निरवस्थ स्वस्वरूपतेच्या  ।। ।।१७।।

 

संध्याकाळी ०७.४०

 

स्वस्वरूपता हा नि:स्थंडिलींचा याग।

निर्देह भावैक्यांचा अनुराग।

भस्म भास्वरेचा संभोग नि:संग।

धूत नारायण वैभव हें!  ।। ।।१८।।

 

नवनारायणाची अंत:संगति।

श्रीत अवस्थेची या सहजा व्याहृति।

स्नेहाळल्या, संमतल्या जीवांची व्यवहृति।

क्रिया प्रक्रियांचा समुन्मेष हा!  ।। ।।१९।।

 

दिलें, घेतलें, आणि वाढविलें वैभव।

पाहिला, दाखविला, संकर्मयोगाचा प्रभाव।

सांगितला, ओळखला, धूतनारायणांचा आशीर्वर्षाव।

प्रभातकाल हा ब्राह्मव्योमींचा  ।। ।।२०।।

 

संध्याकाळी ०८.००

 

ब्रह्मणस्पतीचे भूमा प्रज्ञान।

बृहस्पतीचें वाक् संवितोत्थान।

नवनारायणांचें शुक्लध्यस्त संयोगभान।

‘चौरंगल्या’ ब्रह्मदेहीं!   ।। ।।२१।।

 

अभिनव शब्द हा स्फुरला अद्यतनी।

‘अनाहूत बिंब’ हें दीपलें ब्राह्मव्योम्नीं।

अपूर्वश्रुत आदेश हा संचरला श्रीमहाधाम्नीं।

अलख् प्रकाश-माध्यान्ह हा!  ।। ।।२२।।

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