उन्मनी वाङमय

शंकरदास कहे माया हटा कर कृपा करा

१९-२-४३

 

अर्जुन बृहन्नडा झाली ग बाई मी झाली।गोपालकृष्णा करितां।।

आत्मसुख लाभायला। (प्राप्तीकरितां)

आत्मसुखाकरितां। तळमळते मी।प्रेमामुळें बंधन करिती।।

शंकरदास कहे माया हटा कर कृपा करा हंपे (माझ्यावर)।

माया ब्रम्ह।। 

राग भैरव    

 

१७/४/४३

 

वितानली 'शं' बीजाची नवलनीलिमा।

संतानली 'रं' बीजाची सौभाग्य सुषमा।

थैमानली `लं` बीजाची विद्युत्धवलिमा।

त्रिवृत्करण हें मत्स्य संहितेचें! ।।१।।

   

 

विस्तारल्या वाळवंटीचा वालुकाकण!।

`कं` काल कैवल्याचा हा कलशक्षण।

त्रिपदा गायत्रीचा पान्हवलेला स्तन  ।।    

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