उन्मनी वाङमय

श्रीसद्गुरू माणिकप्रभु महाराजकी जय'।।

४/१०/४२

 

`भक्तकार्यकल्पद्रुम   गुरूसार्वभौम श्रीमद्राजाधिराज

योगीमहाराज त्रिभुवनानंद  अद्वैत अभेद निरंजन निर्गुण

निरालंब परिपूर्ण सदोदित  सकल मतस्थापित

श्रीसद्गुरू माणिकप्रभु   महाराजकी जय'।।    

 

२१/११/ १९४२    

 

स्पर्शमण्यांची माळा ओघळली।

श्याममेघींची वसुधारा पाघळली।

कीं या क्षणीं सहस्त्र सहस्त्रारें साखळली।

द्वैताद्ैत समाधि हा!!!  ।। ।।१।।  

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