उन्मनी वाङमय

२८ सप्टेंबर १९३८

२८ सप्टेंबर: 

एकूण ११२ श्लोक

 

१०.२२ सकाळी

माझें शाब्द मणिपीठ।

तेथ प्रकाशे वन्हिवषट्।

‘क्लीं’ बीजाचा मंत्रमठ।

त्या नांव `ललितागार`   ।। ।।१।।

 

श्रीकंठ वेदसंख्य।

शिव युवती कोशसंख्य।

मूल प्रकृति गृहसंख्य।

अष्टादश हे अधिष्ठानस्पंद   ।। ।।२।।

 

ऊर्ध्व ऊर्ध्व उन्नयन भूमिका।

अधो अधस् प्रत्यावृत्ति भूमिका।

कुहरिणीच्या प्रकाश पंखा।

उन्मेष निमेषवत् ।। ।।३।।

 

सुषुम्ना मार्गीचा संसार।

पल्लवलाजो व्याहत्तर सहस्त्र।

काल परिमाण एक संवत्सर।

जेथ अध्याहृत  ।। ।।४।।

 

चौसष्ट कळांच्या पाकळया।

आज्ञा चक्रीं उन्मेषल्या।

ललितेच्या पदपद्म स्पर्शे सौरभल्या।

सहस्त्रारल्या स्मितस्पर्शें   ।। ।।५।।

 

पंच चक्रांची रंगपंचमी।

अवतरली सहस्त्रारधामीं।

नवोनवली नमात्मीं।

नवात्मविद्या ललिताकृति   ।। ।।६।।

 

नवप्रकृतियांची करूनि बासरी।

‘लं, रं, वं, यं, हं’ स्वरीं।

आधारविली मूलाधारीं।

वर्षविण्या ललितागीत  ।। ।।७।।

 

मूलाधारात गिरनारमृत्तिका।

स्वाधिष्ठानांत तेजोगर्भ कौतुका।

मणिपुरांत नील प्रकाश लेखा।

चक्रविद्येची प्रथम त्रिपुटी  ।। ।।८।।

 

अनाहतांत ॐकारलेंलें रुप।

विशुद्धिकें त स्वर्णलेले श्रीभूप।

आज्ञाचक्रीं विद्यूत पंख।

लवलवती ललितेचे  ।। ।।९।।

 

त्या पंखात तीन बीजें।

त्रि देहानों दर्शने कीजे।

येथल्या चरण तीर्थे रुजे।

अक्षयवट श्रीविद्येचा   ।। ।।१०।।

 

विस्तार तुझा अक्षयवटा।

तेजाळला चौसष्ट कलांनीं चोरवटा।

जयें आच्छादिलें साक्षात् नीलकंठा।

जय जय! ललितामाऊली!   ।। ।।११।।

 

ललिते, कुहरिणी, कुलस्वामिनी।

घन, घन श्याम श्याम धामिनी।

शं, शं, शीतल शीतलयामिनी।

प्रणति तुला आज्ञा केंद्रीं   ।। ।।१२।।

 

श्री विद्येच्या सौंदर्य लहरी।

प्रभातल्या सहस्त्रारीं।

प्रकर्षल्या गिरनार शिरीं।

येथ सांडले तेज:तुषार  ।। ।।१३।।

 

१०.५० सकाळी

 

कुशलेनें आलोचिलें पद्मधन।

अवघ्राणिलें मूल कुलचरण।

आहवानिलें श्रीविद्या शरण।

येथ शरण पीठीं   ।। ।।१४।।

 

ललिता दर्शनाची स्वर्ण प्रभा।

लोकेश्वरा देतसे आलंबा।

विशुद्धिकेच्या तेजोगर्भा।

मृत्तिकेंत कालवुनी    ।। ।।१५।।

 

मृत्तिका ती मूलाधार।

तेथ वीस सप्त् नक्षत्रांचा संसार।

आणि ललिता श्यामेच्या संचार।

आदिगुहेंत ह्या   ।। ।।१६।।

 

ललितेचा येथ सौभाग्य तिलक।

ललितेचा येथ विलास मंचक।

ललितेचा येथ कृपाकटाक्ष।

ललिता येथ साक्षात् श्रियली!   ।। ।।१७।।

 

श्रीविद्येची फल प्रवणता।

श्रीविद्येची ऋतोन्मुखता।

श्रीविद्येची आदिस्वरुपता।

तें ललिता दर्शन   ।।  ।।१८।।

 

११.०० सकाळी

श्रीविद्येची नेत्रिंलेली सुषमा।

श्रीविद्येची चांदलेली यामा।

श्रीविद्येची व्यक्तलेली श्यामा।

ललिता सुंदरी    ।। ।।१९।।

 

ललितारुप मणिपीठीं मुळलें।

ललिता ध्यान श्रीरुपीं खुळलें।

ललिता शस्त्र ‘शं’ नाहीं त्रिशूळलें।

शुक्ललें, श्यामलें, आदिनाथलें ।। ।।२०।।

 

शुक्ल, कृष्ण, शुक्ल कृष्ण अशुक्ल अकृष्ण।

हें कर्म संख्यान।

कर्मेश्वरीनें बेरजविलें शून्य।

कर्मेश्वरी ललिताकारा   ।। ।।२१।।

 

कर्मशून्यतेची शुक्लविभूती।

बंधमोक्ष भावांची ओहोटी।

कैवल्य चितिची निराकार राहुटी।

ललिता-मंदिर हें   ।।          ।।२२।।

 

मूल स्व-मणी, त्रिनेत्र मिटिलें।

अनाहत विशुद्धीं, आज्ञा उघडिलें।

ऐसी उघड-मीट अविच्छिन्न चाले।

नील सहस्त्रार वजाबाकी   ।। ।।२३।।

 

षट् चक्रधर्मी आदिनाथ।

षड् रसवान मी आदिशाक्त।

षड् दर्शनकार मी आदिपंथ।

श्री भूपोत्तम पहुडलो येथें   ।। ।।२४।।

 

 

११.१७ सकाळी

माझ्या नवात्मदेहाची प्रभा।

ललिता श्रीविद्येचा रत्नगाभा।

येथल्या आजच्या महाप्रारंभा।

ओळख ओळखील ती  ।। ।।२५।।

 

११.१८ सकाळी

शुक्लांबर धरा शुक्लवर्णा।

रक्त पुष्पिणी रक्ताभरणा।

पीतांबरीं पीत-पीतवसना।

आज येथें कृष्णली!   ।। ।।२६।।

 

११.२३ सकाळी

जय जय! ललिताकारे श्री विद्यें!।

श्रीभूपतींच्या श्रीध्यान संध्ये ।

लोकेश्वरांच्या श्रीलोक वंद्ये।

जय! ललिते! योगेश्वरि!  ।। ।।२७।।

 

११.२७ सकाळी

 

श्रुतीचें दृश्य ध्यान।

दर्शनाचें श्राव्य गायन।

अदृश्य अश्राव्याचें स्पष्टस्पर्शन।

श्री विद्या गुह्य।। ।।२८।।

 

एकादशेंद्रियांचा संयुक्त प्रकाश।

षट्चक्रांचा वियुक्त विलास।

षड्विद्यांचा श्रीयुत संन्यास।

श्रीविद्या ललिता कारली  ।। ।।२९।।

 

कलासंख्य कांहीं अंश।

भूतसंख्य कांहीं विशेष।

तत्त्वें एकूण एकवीस।

ललिता-शास्त्रीं मूलभूत  ।। ।।३०।।

 

प्रतीतींच्या छायेंतला प्रकाश।

विकारांच्या कंडूंतला कटुदंश।

विज्ञानांच्या वैभवाचा तेजस्पर्श।

विवेकिते ललिता शास्त्र।। ।।३१।।

 

सृष्ट दृश्यांतील सौंदर्याधान ।

शांतिव्योमाचें शब्दानुनादन।

श्यामविशेचें ज्योत्स्नाभवन।

ब्रह्मविद्या ललिताकारली   ।। ।।३२।।

 

ललितेचे पदन्यास।

कुशलतेचा श्रीसंध्यास।

श्रीपरंपरेचा प्रथमोल्हास।

येथ बुद्बुदला!   ।। ।।३३।।

 

सकाळी ११-४० ते ११-५५ 

 

जागृहि! जागृहि!

जीवकोशा!।

उत्तिष्ठत, उत्तिष्ठत संप्रदाय वंशा!।

निबोधत निबोधत श्री अलक्ष्यलक्षा!  ।। ।।३४।।

 

श्रीकृतांनों! श्रीधृतांनों! फाडा जीर्णवस्त्रे।

श्रीस्मृतांनों श्रीपृतांनों मोडा जीर्णशस्त्रें।

श्रिया संपृक्तांनो, श्रिया संपुक्तांनो त्यागा स्वात लक्तरें।

स्वाधिष्ठान स्थिरवूं या!  ।। ।।३५।।

 

आभरा आभरा ही प्रकाश-श्री।

डोळवां डोळवा भ्रूमध्यींचा कलिकाशशी।

आरोहा आरोहा श्रीसंप्रदायवंशीं।

जय जय! वंशराजा   ।। ।।३६।।

 

ललितेच्या प्रवाह शीर्षी ।

नाथचरण रज:पुष्प न्हाई।

त्या रजोदर्पणीं ही आदिगुहा ध्यायी।

श्रीविद्या विलास!   ।। ।।३७।।

 

स्वस्तिश्रिये! ललितागारे! आदिगृहे!।

लोकेश्वर ध्यानींच्या श्यामदेहे!।।

श्रीगतांच्या वरद अभये!।

स्वस्तिदे! शारदे! ॐजननिये!   ।। ।।३८।।

 

दुपारी १२-०० ते १२-१५

 

`प्रेम' आमुचा श्रौताचार।

गुरूदेह आमुचा मूलाधार।

मानस आमुचे पूजासंभार।

ललिता शास्त्र सहजश्रुती   ।। ।।३९।।

 

आश्लेष आमुचा देहयज्ञ।

आदेश आमुचा आत्मवेद।

संदेश आमुचे व्योमनाद।

संप्रदाय स्वच्छंद हा!  ।। ।।४०।।

 

श्रियलेले आम्ही पामर।

प्रियलेले लोकलोकेश्वर।

क्रियलेले आम्ही श्यामसंस्कार।

सदैव शुचिर्भूत!   ।। ।।४१।।

 

श्री शुचिर्भूते कुशले! विद्याकले!।

येथ धर्म नीति शास्त्रसंग गुह्यलें।

कलंकित देह धवलिले।

जय श्री! ललिता प्रताप   ।। ।।४२।।

 

भारतीया ललिता संस्कृती।

श्रीसौंदर्य लहरींची धात्री।

ललिता जान्हवीच्या व्योमपात्रीं।

अमृतधारा वोसंडली  ।। ।।४३।।

 

ललितागारांत प्रतिध्वनले ॐकार।

जीव पांखरांनो लगबगे करा स्वीकार।

लोकेश्वरांचें चरणतीर्थ तुषार।

सांठवा हृदय देशीं!  ।। ।।४४।।

 

आचार  शास्त्रांचें परममांगलय।

धर्मस्मृतींचें संपुटित गुह्य।

पूजाविधींचे विधान नव्य।

विशुद्ध प्रेम हें   ।। ।।४५।।

 

ललितेचा नित्योत्सव।

जीवजीवाचा संश्रित प्रेमभाव।

ऋजुतेचा निस्सीमगाव।

सभामंडप ललितेचा  ।। ।।४६।।

 

दुपारी १२-२६ ते १२-३९ 

 

श्रीदीपशिखा ज्वालावली।

मणिस्थप्रभा माध्यान्हली।

शब्दवाणी मध्य गगनली।

श्रीपीठस्थ सरस्वती   ।। ।।४७।।

 

 

पूर्णान्न चाखा पूर्णजिव्हया।

पूर्ण,प्रज्ञा ओळखा पूर्ण धिया।

पूर्ण प्रभा डोळवा सुभग दृशा।

ललिता सौंदर्य-नेत्रोत्सव हा   ।। ।।४८।।

 

नेत्रोत्सवाचा आज मंगलमुहूर्त।

नित्यमहापूजेचा नील संभार साक्षात्।

नित्यचितिचा नैवेद्य मूर्तिमंत।

ललितेनें वाढिला तुम्हां! ।। ।।४९।।

 

ओष्ठवा महानैवेद्य नीलचिती।

तुष्ठवा उर्ध्वभाव कुलगीत गतिचा।

सुष्ठवा सहजोन्मेष सौभाग्य मतिचा।

जय! सुभगे! ललिता कृती ।। ।।५०।।

 

दुपारी १२-४१ ते १२-४७

 

हरवलें आमचें कर्मभान।

साधलें आमचें अवस्थाहनन।

साक्षात्कारिलें महाजीवन।

निरूपाधिया!  ।। ।।५१।।

 

निर्हेत करूनि जीवन व्यापार।

महाजीवन चाखिलें निराधार।

भृतस्मृतींचा केला संहार।

वर्तमान ज्वालेंत  ।। ।।५२।।

 

वर्तमान माझें कालस्वरूप।

भूतभव्य सांततेचा क्षुद्रदर्प।

सुखचैतन्य लुटिजे अमूप।

अद्य मुहूर्त महोत्तम!   ।। ।।५३।।

 

ललितेचें लालित्त्य वैभव।

सत्त्वगुणाचें स्वस्वरूप शैव।

श्रीसख्या! उपभोग सुखेनैव।

सुखासीना ललिता श्रिता!  ।। ।।५४।।

 

दुपारी १२-५० 

 

जीवन व्यापार लीलाललितेची।

व्योमसंचार क्रीडा श्रीश्रीश्रीची।

शून्यविस्तार नाट्यें नटेश्वराची।

लालित्य-श्री चितिनाट्य  ।। ।।५५।।

 

रजोगुणाचे गुलाल।

त्यांत लोकेश्वरांचे स्नातलें भाल।

ललितेचें नृत्यपाउल।

ओळख तेथलें स्वस्तिरूप   ।। ।।५६।।

 

स्वस्तिवाक्यांचें मिष्टान्न।

शून्यस्वस्तिकाचें स्थिरध्यान।

महाचेतनेचें प्रतिभान।

ललितेचा वरदहस्त   ।। ।।५७।।

 

त्रिदेह त्रिपुरले या मंगलक्षणीं।

त्रिभाव विखुरले महास्वप्नीं।

त्रिलोचन प्राप्तले गुहाव्योम्नीं।

दिगंश कैलासला!  ।। ।।५८।।

 

पंचकोश पंचपक्वान्नें।

महाचैतन्य सेवी निर्वेधपणें।

ललितेच्या चित्प्रसाद,  दानें।

तुष्टतुष्टलों ‘नेतिपरम्’! ।। ।।५९।।

 

सुषुम्नेच्या संथ पवनीं।

वाहे सौरभ कुंडलिनी।

मूलापासोनि सातव्या धामीं।

आज सुलभ यान निर्याण  ।। ।।६०।।

 

अन्नकोश आनंदरसला।

नक्षत्रदीप निशानाथला।

दुग्धबिंदू क्षीरसागरला।

शेषशायिला महाक्षण हा!  ।। ।।६१।।

 

येथ पहुडले नीलकृष्ण।

नारदलें माझें महाराष्ट्रभाषण।

ललितेचें चिन्नृत्यक्रिडन।

चाललें समंतत:   ।। ।।६२।।

 

जागृत सुषुप्तीची पाऊलें दोन।

स्वप्नस्थितीचें स्वैरसंचरण।

आणि कुशल संवादन।

तुरीयेचें  ।। ।।६३।।

 

जय श्रिये! नृत्येश्वरी! कुशलेश्वरी!।

ललिते! तूं नाथल्या प्राणांची प्यारी।

तुझ्या पदव्युत्क्रमांची रीति न्यारी।

भान त्याचें लोकेश्वरां   ।। ।।६४।।

 

बेभानलेले अष्टदिक्पाल।

चैतन्य हस्तें नादविती करताल।

शून्य व्याहृतींचे नि:शब्द ख्याल।

उमटले, नाचले या गुहेंत   ।। ।।६५।।

 

येथ हो नि:संदेह पूर्णतेनें।

येथ गा नाच तन्मयतेनें।

येथ स्वाद पूज शिर:कुरू चिन्मयतेनें।

`ब्राह्मणदेह' व्यक्तलेला!   ।। ।।६६।।

 

गगनाकार ललितेचें सौभाग्य।

उपभोगाकार ललितेचें वैराग्य।

श्यामाकार ललितलेल्यांचे मार्ग्य।

सुदृश्य सुभोग्य सुखालोच्य येथें   ।। ।।६७।।

 

 

क्षण म्हणजे कोटिकल्प युगें।

रेणु म्हणजे अनंतकोटि नगें।

मायाविनी ललिते जिवलगे।

तुझें शास्त्र नेतिस्वरूप   ।। ।।६८।।

 

गिरनार तुझा केशकलाप।

श्यामशून्य तुझा सीमव्याप।

मंत्रदेह तुझा अवतरे आपेआप।

हेत कोण असे चित्तीं?  ।। ।।६९।।

 

कोणत्या जीवकुलाच्या उद्धारा।

कोणत्या पांगुळल्या लोकेशाचा आधार।

कोणत्या वैभवाचा प्राकार।

उभवूं घातला? ।। ।।७०।।

 

साहारलेल्या ऐशा कोणत्या।

पात्रांत आरंभिसी सलिलनृत्या!।

सावरिसी चैतन्य धृत्त्या।

कोणचें प्रलयमानविश्व?  ।। ।।७१।।

 

पालविसी कोठला भग्नला पंख।

दीपविसी कोठली अंधारली दिक्क।

स्वच्छविसी कोठलें डागळलेंलें सौख्य।

ललित स्पर्शें?  ।। ।।७२।।

 

कोणता प्रसन्न प्रभास्वरनाद।

आहवानितो तव पुष्पितनृत्य पाद।

कोणत्या व्योमचिन्हाचा हा पडसाद।

ललिते अद्यागमन तुझें?  ।। ।।७३।।

 

सुरुचिर सुरेख पाऊलठेव।

सुभग सुकौतुक अंगविभाव।

स्वर्ग्य साभिप्राय गीतवर्षाव।

कुणासाठिं हा?  ।। ।।७४।।

 

कोणतें चितिपुष्प प्रफुल्ललें।

कीं जसा सौरभें आकर्षिलें।

तव दीप्तीनर्तन जें ललितलें।

येथ आज ललिते?  ।। ।।७५।।

 

`स्वयंभू मी सौंदर्यलहरी।

स्वतंत्र मी महाचैतन्य नारी।

स्वयंप्रभ मी विभुसंचारी।

सहज येथें पातलें  ।। ।।७६।।

 

येथ माझी नृत्यशाळा।

येथ माझा वास विस्तरला।

येथ माझा लाडिकभाव व्यक्तला।

नृत्यवतीचें चिन्नृत्त्य हें  ।। ।।७७।।

 

दुपारी १-५२ 

 

येथूनि चैतन्यसरित् उगमेल।

मुळवील येथें श्रीवेंल।

येथ स्वयं श्री श्री श्रीपति कुळवील।

संप्रदाय वंश  ।। ।।७८।।

 

सांपडल्या जीवमौक्तिकां लेईन।

प्रभासल्या कारणदेहां घेईन।

प्रकर्षल्या स्त्रीपुरूषां नेईन।

पदरीं बांधोनी कष्टतांही ।।७९।।

 

दुपारी १-५६

माझ्या जीवबाळांचें कोड पुरवीन।

माझ्या संप्रदायशिष्टांचे ब्रीद मिरवीन।

माझ्या गुरूब्राह्मणाचें रुप शीर्षवीन।

लौकिक विश्वीं  ।। ।।८०।।

 

मणिपीठ श्रीविद्येचें स्थिरासनलें।

मत्स्यासन श्रीदेहाचें प्रकटलें।

गोगीत गोरक्षाचें निनादलें।

येथ रंगला! चौरंगी!  ।। ।।८१।।

 

ललिताविद्येचा हस्तक।

नवश्रुतीचा प्रपाठक।

ब्राह्मणदेहाचा प्रपूजक।

जय! श्रीचौरंगीनाथ!  ।। ।।८२।।

 

मी ललिता आकृष्टलें।

चौरंगी नाद अनुशब्दलें।

शब्ददेहीं रुपावलें।

निर्देह सौंदर्यशालिनी  ।। ।।८३।।

 

माझ्या सौंदर्याचा साज।

चौरंगि नाथांनी लेवविला आज।

चौरंगमूर्ती स्वभावें ज्ञानज।

यथार्थ उक्ति येथली  ।। ।।८४।।

 

ललिताविद्येचा कूटस्थ आत्मा।

मूर्ती त्याची मेघश्यामा।

अंग चित्सत्ता सार्वभौमा।

जय श्री! महिषी! ललितासखें!  ।। ।।८५।।

 

क्वचित् शतसहस्त्रीय संवत्सरीं।

ज्ञानज मजला नादवुनि साकारी।

प्रतिनाद तुझा ब्राह्मणशरीरीं।

व्यक्तला तेजस्पर्शे ।। ।।८६।।

 

आल्यें, धावत्यें, संनिधल्यें।

प्यालें, भोजिलें, मंगलल्यें।

ब्राह्मणदेहीं मेळलें खेळल्यें।

सहेतुक हा अवतार  ।। ।।८७।।

 

दुपारी २-१३ 

उधळीन सौभाग्य चौफेर।

फुलवीन हिरण्मय पुंकेसर।

झुलवीन श्रीकौस्तुभ भास्वर।

माझ्या ललितशीर्षीं   ।। ।।८८।।

 

दुपारी २-१६ 

माझें अभय अलौकिक।

धांवलें ऐकुनि तुझी हांक।

प्रारंभिला येथ महामख।

यजमान ललिता मी  ।। ।।८९।।

 

दुपारी २-१९ 

 

याज्याहुति कलंकितचैतन्यें।

याज्य कुशलस्वरूप प्रकाशपुण्य।

स्वीकारिलें मीं आतित्थ्यन।

कुशलप्रभा! ।। ।।९०।।

 

हेत माझा सफळेल।

नृत्त्य माझें प्रफुल्लेल।

मंत्रदेह माझा हिरण्मयेल।

नि:शंक मी, तुम्हीहि व्हा!  ।। ।।९१।।

 

आर्तलेले करूणजीव।

धन्यतील तुम्हां व्यक्तवितां श्रीविद्यास्वभाव।

जेथ कोटिजीवविश्व सापडे ठाव।

चुकल्या बाळकां   ।। ।।९२।।

 

माय मी धरीन पदरा आड।

कळवळलेले जीव, भ्रष्टले भ्याड।

नेईन ब्रह्मभावा पल्याड।

चुंबुनि निजवीन, श्यामवीन ।। ।।९३।।

 

लाडक्यांनों! उगी व्हा!नका गाळूं अश्रू ।

वेल्हाळांनों, धावलें मी, लागा गडे हंसू ।

बगडयांनो आतां खेळूं, उल्हसूं।

आज ललितापंचमी ना!  ।। ।।९४।।

 

ललितेनें हास्य हस्तांत कुरवाळिले।

ललितेनें लास्य नेत्रांत बिंबविलें।

ललितेनें साक्षिभास्यांत श्यामविलें।

अवघें चैतन्यविश्व  ।। ।।९५।।

 

दुपारी २-३४ 

 

आज महापूर आला ललितानदास।

आज ब्राह्मण चढला नाथपदास।

त्याचा कोटिजन्माचा दासानुदास।

मी `चौरंगी' हांकेसी शब्दलों!  ।। ।।९६।।

 

दुपारी २-३७ 

चित्तचक्षूंत कवडसे थयथयले।

जीव चैतन्यांत महाचैतन्य प्रस्फुरलें।

कारणाग्रीं महाकारण आसनावलें।

लालित्य चित्रलें तेजाळ  ।। ।।९७।।

 

क्षणार्धांत मृतिदेह काष्ठविला।

सुवर्णनिमिषीं व्यक्तिभाव मालवला।

रत्नमुहूर्तीं जीवात्मीं ठाव ढासळला।

दूरापास्तल्या ज्ञानवृत्ती   ।। ।।९८।।

 

त्यांचे चरणयुग्म हेरलें।

तदुपरी तुलसीपत्र प्रतिष्ठापिलें।

श्रीत जीवा आव्हानिलें।

वोपिलें रहस्यरत्न!  ।। ।।९९।।

 

श्रितांच्या महाप्रसादें।

“श्रीसद्गुरुं! ‘दासोsहं वंदे’।”

जयजय! ललिते परमानंद दे!

तुझा माझा महोत्सव हा   ।। ।।१००।।

 

साक्षात् पाऊलपीठ स्पर्शिलें।

मी मम जाड्यदेह विमर्शिले।

‘ब्राह्मण’बीज महत्कृपया प्रदर्शिलें।

जय! अलख्! जय! ललिते!   ।। ।।१०१।।

 

प्राज्ञिलेली देहोsहं वृत्ती।

आच्छादिलेली सोsहं भगवती।

आज्ञिलेली ‘कुशला’ वृत्ती।

चौभुजलेला नाथदेह मी   ।। ।।१०२।।

 

‘ब्राह्मण्य’ म्हणजे शुद्धसत्त्वस्थिती।

‘ब्राह्मण्य’ म्हणजे महाप्रज्ञानश्रुती।

‘ब्राह्मण्य’ म्हणजे प्रेमस्मृति।

नाथाळलेली    ।। ।।१०३।।

 

आमुचें ब्राह्मण्य वर्णातीत।

आमुचें श्रुतिगीत कर्णातीत।

आमुचें वायुस्पंद पर्णातीत।

व्योमगानजाति अद्भुत ही   ।। ।।१०४।।

 

विशुद्ध निष्ठा प्रज्ञापूत।

आदिशास्त्रांचें हेंच श्रौतस्मार्त।

विधियज्ञ आमुचा निर्व्याजत्व।

सहजाचार श्रीधर्म  ।। ।।१०५।।

 

येथ ब्रह्मभाव शरमले।

येथ समाधिदेह नरमले।

येथ कापिलकाणाद वरमले, आणि एकभावले ।

‘विविध पंथराज’  ।। ।।१०६।।

 

संदूकीत ठेवला चैतन्य मणि।

ठेवितो काढितो क्षणोक्षणीं।

आम्ही गुरूदेहाचे धनी।

आम्हीच त्याचे सेवक श्वान   ।। ।।१०७।।

 

 

आमुचे सर्वस्व यज्ञहुत।

आमुचे भान मंत्राहूत।

आमुचे कार्य कुशली कृत।

गुरु कृपया  ।। ।।१०८।।

 

तुम्ही अज्ञ, आमुचे ठायीं ज्ञप्ती।

तुम्ही चित्रें, आम्ही मूळ व्यक्ती।

तुम्ही पडसाद, आम्ही नादगती।

प्रतिज्ञा ही श्रद्धेय   ।। ।।१०९।।

 

आम्ही रंग भरू नवलाद्भुत।

आम्ही क्षेत्र पिकवूं, व्यक्तवू  सुवर्ण धान्यांत।

आम्ही दीपवूं विश्व धनत्तमोवृत्त।

आम्ही मशालजी अलख पुरीचें  ।। ।।११०।।

 

आमुच्या माय-अंकीटाका  मान।

आमुच्या श्याम पदरीं  करा पंच द्रव्यदान।

आरोहा आमुच्या स्कंधीं बेभान।

नील व्योमीचीं पांखरें तुम्ही   ।। ।।१११।।

 

सहजवृत्तींत बिंबवा कर्मसंचितें।

त्यांचें तुमचें न अणुमात्र नातें।

श्रीविद्येच्या कटाक्ष पातें।

निरंजनवां स्वात्मभाव   ।। ।।११२।।

आमचा पत्ता

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