उन्मनी वाङमय

श्याम - छटा श्रीब्रम्हरंध्र वियद्व्यापिनी। त्रिवृत् - प्रणव हा संवित्सामाचा! ।।

१४-५-३९

 

समन्वयाची सम्यक् समीक्षा।

अनुग्रहीतांची वेधदीक्षा।

वागग्नीची `रं' वर्णकक्षा।

संविद्भू ही अक्षरोत्तमा ।।            ।।५।।

   

संविदवीणा ही धूत-आदेश ध्वानिनी।

`यं' `मं' `नं' इति श्रीकल्याण रागिणी।

चिरोत्थिता वा परात्पर कुलकुंडलिनी।

निरवस्थिति कीं अवस्थावतंसा ।।        ।।६।।    

 

`बीजंमा' ही स्वस्वरूपसंवेद्या।

संज्ञान शलाकांची संग्राहित संज्ञा।

परंप्रकाशिनी वा स्थिरसंचारिणी प्रज्ञा।

कैवल्यगौरा संविद्शांकरी।। ।।७।।    

 

आज्ञाब्जाचा धवलगिरी।

रजतरसला श्रीसहस्त्रारीं।

अधिष्ठानाच्या अध:कैलासकुहरीं।

संवित् श्रोतसाची गंगोत्री  ।।              ।।८।।    

 

पद्ममूला संविद्गता पीतश्रेणी।

विशुद्धिस्फूर्ता संवित्शलाका धवलस्वरूपिणी।

श्याम - छटा श्रीब्रम्हरंध्र वियद्व्यापिनी।

त्रिवृत् - प्रणव हा संवित्सामाचा! ।।            ।।९।।    

 

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