प्रकाशित साहित्य

श्रीगुरुपादुकोदयस्तोत्रम

 आज मुहूर्तवूं या एक नित्योत्सव।

अद्वैत आमोदें, जेणे फुलेल हें विश्व।

क्षणोक्षण प्रभातेल नवोनव महापर्व।

प्रसादचिन्ह श्री-श्री-श्रीविद्येचें।।१।।

 

परा, परापरा, अपरा।

श्रीगुरूपुजा ही त्रिशिरा।

विमर्शा माऊलीची ही स्तनदुग्धधारा।

ओष्ठविण्याचा समय हा।।२।।

 

‘अपरा’ आराधनेंत भेद-ग्रह-स्थिती।

‘परापरा’ अवस्थेंत भेद-अग्रह-वृत्ती।

‘परा’ अवस्थानांत अभेद-स्फूर्ती।

श्रीगुरूपुजेची पादुका ही।।३।।

 

आदिभान हें परात्परगुरुबीज।

विमर्शशक्ती श्रीशिवा गुरूविद्येची गुह्यशेज।

जीवूजीवूचा पहिला परिव्राज।

गुरूपादुकेचें आलोचन ।।४।।

 

एक उफराटे अ-कुल ब्रह्मपद्म।

तेथ निष्कलेचे निजशक्तीधाम।

निर्झरले व्यापिनीचे श्यामव्योम।

अमृतमेघ वोसंडला।।५।।

 

चतुष्कोणी देवतात्म्यांचे उगमस्थान।

बिंदुस्थली अमृतसिद्धीचें अनुभावन।

यथाक्रम आंतर अनुभवांचें अनुस्थापन।

श्रीगुरूविद्येचा सहजाचार हा।।६।।

 

‘विमर्श’ म्हणजे आदिभानस्थित चित्शक्ती।

पादुकोदय म्हणजे शिवशिवेची साम्यरसस्थिती।

गुरूकृपयैव या भाग्यश्रीची समवाप्ती।

‘गुरूकृपा’ ये नामें जीवू जीवूचें निरवस्थान।।७।।

 

‘चार’ म्हणजे सोपचार आराधन।

‘राव’ म्हणजे विमर्शशक्तीचें उपयोजन।

‘चरू’ म्हणजे द्रव्यगुणांचे संयोगीकरण।

‘मुद्रा’ या नांवे प्रतीकाचा प्रत्यंगभाव।।८।।

 

चित्गगन-चंद्रिकेची फेसाळली जान्हवी।

श्रीगुरूकृपेची वेल्हाळली की पान्हवी।

प्रकटली वा नीलाब्जाची श्रीसुषमा अभिनवी।

श्रीपादुकोदय स्तोत्र हें ।।९।।

 

श्रीनवशुक्तिकांचा सम्यक् समुल्लेख।

येथ दशोपनिषद्रहस्याचे महावार्तिक।

आदिकृपेचा जणुं संतताभिषेक।

श्रीगुरूपादुकोदयस्तोत्रम्।।१०।।

 

।।इति श्री गुरूपादुकोदय स्तोत्रम्।।

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